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    Home»ब्लॉग

    सेना की पिच पर इमरान की इनिंग

    By July 26, 2018 ब्लॉग No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    पाकिस्तान में चुनाव, प्रजातन्त्र,और संविधान की हकीकत एक बार फिर सामने आई। आर्मी और आतंकी संघठनों की इनायत इमरान खान के हक में थी , वह मुल्क के प्रधानमंत्री बनेंगे। लेकिन यही तत्व उन्हें बड़े बहुमत से विजयी होते नहीं देखना चाहते थे। अन्यथा इमरान भी नवाज शरीफ की तरह अधिकारों का दावा कर सकते थे। इमरान नेशनल असेंबली से लेकर बाहर तक कमजोर रहेंगे। ऐसे में उन्हें सेना के इशारों पर आंख मूंद कर अमल करना होगा।
    लोकप्रियता में नवाज शरीफ आगे बताए जा रहे थे, उन्होंने इमोशनल कार्ड भी चला था। लंदन के एक अस्पताल में जीवन मृत्यु से जूझ रही पत्नी के साथ नवाज और बेटी मरियम की फोटो भावुक करने वाली थी। उन्हें अकेला छोड़ कर नवाज और मरियम पाकिस्तान वापस आ गए थे। वह जानते थे कि स्वदेश पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। यह सब उनकी चुनावी रणनीति का हिस्सा था।  लेकिन इसका भी उन्हें फायदा मिला। बेनजीर भुट्टो के बेटे विलावल ने पहली बार चुनावी विरासत संभाली थी। लेकिन  तीसरे नम्बर पर सन्तोष करना पड़ा। जबकि इमरान खान को आर्मी ,आतंकी संघठनों और कोर्ट  का समर्थन पहले ही मिल चुका था। ऐसे में उनका प्रधानमंत्री बनना पहले ही तय हो चुका था।
    पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व किसी से छिपा नही है। आधे समय तक सेना का प्रत्यक्ष और आधे समय तक अप्रत्यक्ष शासन रहा है। निर्वाचित सरकार को भी सेना के इशारे पर ही चलना होता है। नवाज शरीफ ने अपनी मर्जी से कुछ फैसले लिए थे। इसमें भारत के साथ शांतिपूर्ण   रिश्ते और आतंकियों के खिलाफ कार्यवाई का निर्णय शामिल था। इसी के बाद नवाज सेना की नजर से उतर गए थे। इमरान ने इसका लाभ उठाया। उन्होंने सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। तभी सेना ने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाने का निर्णय ले लिया था।
    पाकिस्तान की नेशनल असेंबली की सदस्य संख्या तीन सौ बयालीस है। इसमें दो सौ बहत्तर के लिए चुनाव होते है। साथ सीट महिलाओं और दस सीट धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित है। आम चुनावों में पांच फीसदी  से ज्यादा वोट पाने वाली पार्टियां इन आरक्षित सीटों पर समानुपातिक प्रतिनिधित्व के हिसाब से अपने प्रतिनिधि भेज सकती हैं। बहुमत के लिए एक सौ बहत्तर का आंकड़ा चाहिए होता है। इस बार नवाज शरीफ  की पाकिस्तान मुस्लिम लीग एन, विलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक  ए  इंसाफ़ के बीच मुख्य मुकाबला था। इसके अलावा सैकड़ों आतंकवादी और अनेक छोटी पार्टियां भी किस्मत आजमा रही थी।  इसे इलेक्शन नहीं सेलेक्शन बताया जा रहा है। प्रधानमंत्री कौन बनेगा यह सेना ने पहले तय कर दिया था। दुनिया में अपने यहां प्रजातन्त्र दिखाने के लिए करीब छह अरब रुपये चुनाव में झोंक दिए गए।
    पांच वर्ष पहले हुए  चुनाव में इमरान की तहरीक ए इंसाफ को  कौमी असेंबली की  बत्तीस सीटें मिली थीं। तब यह माना जा रहा था कि मुस्लिम लीग और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को पछाड़ना इमरान के लिए मुश्किल होगा। लेकिन इस बार माहौल बदल गया। दोनों स्थापित पार्टियां पिछड़ गईं। इसके लिए सेना ने बाकायदा चुनाव  का रुख़ इमरान की तरफ करने का अभियान चलाया था। चुनाव प्रचार के दौरान जम कर हिंसा हुई। तीन बड़े आतंकी हमले हुए। जिसमें सैकड़ो लोग मारे गए। छोटी हिंसक घटनाओं की कोई गिनती नहीं।
    पाकिस्तान की सेना पर  चुनावों में के आरोप लगाए गए थे।  मुल्क के अधिकांश टीवी चैनलों को छोड़कर बाकी चैनलों ने तो इमरान ख़ान को  जीता हुआ घोषित कर दिया था।  ओपीनियन पोल नवाज आगे बता रहे थे।
    सेना ने इमरान का रास्ता साफ करने के लिए नवाज शरीफ परिवार को सुनियोजित ढंग से सजा दी गई। इसके लिए समय का खास तौर पर चयन किया गया। जब नवाज कैंसर पीड़ित पत्नी के पास लंदन में थे, तभी उन्हें सजा सुनाई गई। सेना और कोर्ट का अनुमान था कि सजा के ऐलान के बाद नवाज और मरियम स्वदेश नही लौटेंगे। इस तरह इमरान के सामने कोई चुनौती नहीं रहेगी। इतना ही नहीं नवाज की पार्टी कर उम्मीदवारों को भी खूब परेशान किया गया। विभिन्न आरोपो में उनको नोटिस दी गई।
    मुस्लिम लीग की उम्मीदवारी छोड़ने का दबाव बनाया गया। इससे इतना तो साफ हुआ कि पाकिस्तान के चुनाव बिल्कुल भी निष्पक्ष नहीं थे। इसमें सेना के इशारों पर जम कर धांधली की गई। सेना को कठपुतली प्रधानमंत्री की जरूरत थी। चुनाव परिणाम इसी के अनुरूप है। भारत के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है। इमरान हर तरह से बहुत कमजोर है। एक तो उन्हें बड़ा बहुमत नहीं मिला। इसका मतलब है कि नेशनल असेंबली में उन पर दबाब होगा। उसमें आतंकी और कट्टरपंथी तत्व मौजूद है।
    इमरान ने सेना की सभी शर्ते मंजूर कर ली है। उन्हें सेना के इशारे पर चलना होगा। सेना चाहती है कि भारत वीरोधी नीति पर अमल होता रहे। इसकी आड़ में वह अवैध कमाई में लगी रहती है। इमरान ने आतंकियों का भी समर्थन लिया था। अब उनका भी दबाब होगा। इमरान को इसी माहौल में कार्य करना होगा। अपनी मर्जी से निर्णय लेना उनके लिए मुश्किल होगा।

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