गुरु श्रेष्ठ गुरु परम ज्ञानी होता है गुरु के मार्ग दर्शन से गुरु का शिष्य स्वमं गुरु हो जाता है। गुरु, गुरु होता है चाहे वह आध्यात्मिक गुर से लेकर पढ़ाई-लिखाई एवं ज्ञान देने वाले समस्त प्रकार के गुरुओं के भक्ति विश्वास जताने का एक निश्चित विशेष दिन होता है। आज 27 जुलाई वह विशेष दिन है जिस दिन समाज के अध्यापकों से लेकर समस्त क्षेत्र के गुरु के समक्ष नतमस्तक होकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सर्वोत्तम दिन गुरु पूर्णिमा का दिन होता है। इस दिन को गुरु की विधि-विधान से पूजा करने का नियम हमारे यहां प्रचलित है। प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था के अंतर्गत गुरु के कुटी में रह कर ज्ञानार्जन करने वाले शिष्यों के लिए यह दिन महत्वपूर्ण होता था। विशेषकर यह दिन गुरुओं का ही होता है।
शिष्य अपने श्रृद्धा भाव से परिपूर्ण अपनी सामर्थ्यानुसार दान-दक्षिणा देकर अपने गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता को व्यक्त करते थे। वैसे तो प्राचीन काल मे। गुरूओं का नित्य दिन प्रातः काल शिक्षा ग्रहण करने के लिए आसन ग्रहण करने से पहले गुरु वन्दना करने के पश्यचात पठन-पाठन करने से दिन की शुरुआत हुआ करता था। लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरता गया धीरे-धीरे यह परिपाटी हमारे समाज से विल्कुल ओझल होने के पश्चात आधुनिक पढ़ाई-लिखाई के तौर तरीके विकसित होते चले गये। यहां तक समय के आते आते पठन-पाठन की समस्त पद्धतियां विल्कुल से बदल जाने से गुरु शिष्य के मध्य का वह रिश्ता जिसमे एक शिष्य अपने गुरु का आदर-सम्मान एवं श्रद्धा का भाव का अभाव निरन्तर होता चला गया। विशेषतः वर्तमान समय मे शिष्यों के ह्रदय से गुरुओं के प्रति धीरे-धीरे आदर-सम्मान, सत्यकार-श्रद्धा विल्कुल समाप्त हो गया। इसके लिए केवल आज के गुरु-शिष्य ही जिम्मेदार नही अपितु उतने ही जिम्मेदार हम सब अभिभावक भी हैं।
आज हमारे यहां के परिवारों के लोगों में स्वमं हमारे अंदर नैतिक शिक्षा एवं ज्ञान के अभाव के कारण हम अपने बच्चों में नैतिक शिक्षा से उन्हें शिक्षित नही कर पाते हैं। जिसके कारण आज जैसे हमारे अंदर नैतिकता बोध के ज्ञान का अभाव है तो आगे आने वाले हमारी संतति से नैतिकता एवं आदर्श की अभिलाषा करना ही व्यर्थ होगा, लेकिन इसी तरह हमारे समाज का दिनों दिन अवमूल्यन हुआ है एवं यह क्रम आज भी बदस्तूर जारी है। आज वर्तमान समय मे हमारे अधिकतर स्कूलों में अधिकांश अध्यापक एवं उनके शिष्य अधकचरे ज्ञान के संवाहक लोग हैं एवं ऐसे लोगों को हम आज देश के विभिन्न कार्यालयों से लेकर विभिन्न प्रतिष्ठानों एवं सरकारी महकमों में अनेक स्तरों के अनेकों पदों पर ,अनेक क्षेत्रों में कार्य करते हुऐ एवं परम् ज्ञानी बनकर ज्ञान बांटते ” थोथा चना बाजे घना” वाली कहावत को चिरथार्त करते हुए आसानी से मिल जायेंगे।
‘गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पांव, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए’।।
वास्तव में गुरु कोई व्यक्ति नहीं, वरन् उसके अंदर निहित परम ज्ञानी आत्मा का स्वरूप विद्यमान है। इस तरह हम यह कह सकते हैं कि गुरु की पूजा व्यक्ति विशेष की पूजा न होकर गुरु की देह में समाहित परब्रह्म परमात्मा और परब्रह्म ज्ञान की प्रति मूर्ति की पूजा हम करते है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा विशेष रूप से गुरु पूजन के लिये हमारे देश मे विख्यात है। इस दिन को हम बड़े हर्षोउल्लास के साथ मनाकर गुरु के प्रति आभार एवं कृतज्ञता व्यक्त किये जाने का प्रचलन हमारे देश मे शदियों से चला आ रहा है। इस पर्व को ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता हैं। उन्होंने वेदों के रूप में सम्पूर्ण विश्व मे ज्ञान रूपी दीपक को प्रदीप्त कर उसका विस्तार करने के पश्चात उन्हें संसार में कृष्ण द्वैपायन से वेदोव्यास उपाधि प्राप्त हुई। इसीलिए उनके नाम से इस दिन को गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं।
पुष्पमंडप में उच्चासन पर गुरु अर्थात वेदोव्यास जी को बैठाकर पुष्प मालाएं अर्पित करते हुये उनकी आरती की तथा अपने-अपने ग्रंथ उन्हें अर्पित किए। उस दिन से आज तक सहर्ष शताब्दियों के व्यतीत हो जाने के पश्यचात आज वर्तमान समय तक आते आते गुरु की महिमा एवं भूमिका आज तक ठीक वैसी ही बनी हुई है इसे चाहे हम अपनाएं ,मने या नमाने यह तो हमारी श्रद्धा विश्वास एवं संस्कार के ऊपर निर्भर करता है।
गुरु की महिमा एवं समाज निर्माण में आज भी गुरुओं की वही महत्वपूर्ण भूमिका जैसी प्राचीन समय मे हुआ करती थी ठीक वैसी ही बनी हुई है। यह तो हमारे आपके संस्कार, ज्ञान एवं मानने या न मानने की विषय वस्तु है। गुरु को समर्पित इस पर्व की संज्ञा गुरु पूर्णिमा का महत्व आज वर्तमान समय तक ठीक वैसा ही है और रहेगा। यह बात अलग है कि आज हमारे समाज से बहुत सारे प्रथाओं एवं मान्यताओं के परिवर्तन होने के साथ ही साथ समाज के लोगों के आचरण एवं व्यवहार में अतिशय परिवर्तन आजाने से उसका प्रभाव समाज एवं खुद उनके परिवार से लेकर घर मे पड़ना तय सी बात है।
वैसे तो गुरु के मौजूद रहने पर किसी भी दिन और कहीं पर भी उनकी पूजा की जा सकती है। किंतु सम्पूर्ण भारत में आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन विधिवत गुरु की पूजा करने का विधान है। उस दिन हर शिष्य को अपने गुरु की पूजा कर अपने जीवन को सार्थक करना चाहिए। प्रति वर्ष की अन्य सभी पूर्णिमाओं में से इस पूर्णिमा का महत्त्व सर्वाधिक है। इस पूर्णिमा को इतनी श्रेष्ठता प्राप्त है कि इस एकमात्र पूर्णिमा का पालन करने से ही वर्ष भर की पूर्णिमाओं का फल प्राप्त होता है। गुरु पूर्णिमा एक ऐसा पर्व है, जिसमें हम अपने गुरुजनों, महापुरुषों, माता-पिता एवं श्रेष्ठजनों के लिए कृतज्ञता एवं उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं।
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