गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु
गुरु देवा महेशरा
गुरु साक्षात परम् ब्रह्म
तस्मयी श्री गुरुवे नमः
हमारे भारत वर्ष में विभिन्न धर्मालंबियों एवं प्रथाओं को मानने वाले लोग रहते हैं। हम में से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की शुरुआत हमारे घर -परिवार के छत्र-छाया में माता-पिता के सानिध्य में ही होता है इसलिए हमारे एवं आपके प्रथम गुरु हमारे माँ-बाप ही होते हैं। उसके पश्चात जब हम जीवन के सामाजिक अवस्था के प्रथम चरण में स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने पहुंचते हैं तब हमें हमारे दूसरे गुरु अध्यापक से हमारा परिचय होता है। हमारे जीवन के प्रत्येक चरण में हमारा कोई न कोई गुरु अवश्य होता है। चाहे इस परम् सत्य को हम स्वीकार करे या न करें लेकिन हमारे जीवन मे गुरु के महत्वपूर्ण भूमिका को हम अस्वीकार नही कर सकते हैं। मनुष्य के जीवन में गुरु की उपस्थिति बड़ी आवश्यक है। गुरु ही वह द्वार है जहां से जीव परमात्मा में प्रवेश करता है। गुरु निद्रा व जागरण दोनों अवस्थाओं का साक्षी होता है।
हमें बिना गुरु के ज्ञानर्जन कर ही नही सकते है। यह एक अलग बात है कि हमारा गुरु किस रूप में हमे मिलता या सहायता करता है। क्योंकि हमारे जीवन मे प्रथम एवं द्वितीय गुरु के बाद समाज मे कई तरह के गुरुओं का दर्शन होता है। किसी भी गुरु का ज्ञान एवं आशीर्वाद हमारे लिये सदैव कल्याणकारी होता है।
‘गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पांव, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए’।।
इसलिए हमारे देश मे प्रति वर्ष गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु के पूजा अर्चना करने की परिपाटी है। गुरुपर्व हमारे देश मे आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में पूरे देश में हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। जहां तक हम गुरु की बात करें तो गुरु केवल हमारे देश को ही नही वल्कि सम्पूर्ण विश्व को भारत हमारे देश से ही गुरु मिले हमारे भारतवर्ष में कई विश्व एवं दिव्य गुरु हुए हैं, उनमे से महर्षि वेदव्यास को हमारे धार्मिक ग्रन्थों में प्रथम गुरु के रूप में उल्लेख मिलता है। जिन्होंने हिन्दू सनातन धर्म के चारों वेदों की रचयिता माना जाता है। हमारे सभी तरह के धर्मालंबियों में से सिख धर्म केवल एक ही ईश्वर अपने दस गुरुओं की वाणी को अपने जीवन का वास्तविक गुरु सत्य मानते हैं।

कहते है क़ि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। हमारे संन्तान धर्मालंबियों के ग्रन्थों में इस दिन गुरु के पूजा-अर्चना का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर अपने शिष्यों को ज्ञान की गंगा बहाकर बहाया करते हैं। यह चार मास मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और नही अधिक सर्दी। इसलिए विशेषकर अध्ययन के लिए इसे उपयुक्त समय माना गया हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा जल से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति संचारित होती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति एवं मानसिक शक्ति प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होता है।
आज वर्तमान समय मे हमारे देश के बच्चों का ज्ञानार्जन का केंद्र विद्यालय ही है जिससे पढ़ ज्ञान प्राप्त कर हमारे आने वाली पीढ़ियों से हमारे समाज का निर्माण होता है। इसलिए हमारे माता-पिता के बाद हमारे प्रथम गुरु अध्यापक ही होते हैं और कोई भी अध्यापक राष्ट्र का निर्माण कर्ता होता है। हमारे इस समाज निर्माण कर्ता का जैसे जैसे समय गुजरात गया वैसे वैसे इस समाजनिर्माता एवं अध्यापन का तौर तरीका बदलते चले जाने से घोर अवनति हुई है। आज से लगभग तीन दशकों पहले की पठन-पाठन की बात करें तो हमे यह देखने को मिलता था कि एक स्कूल का विद्यर्थि उसे पढ़ाने वाले अध्यापकों का उसके द्वारा बहुत मान सम्मान किया जाता था। केवल विद्यार्थियों की ही बात नही आज वर्तमान समय मे ऐसे अधयापकों का भी अधिक मात्रा में अभाव हो गया है जो अपने विद्यार्थियों पर गौरान्वित हुआ करते थे।
इस अवस्था के लिए केवल अध्यापक, स्कूल प्रशासन जिम्मेदार नही वल्कि उतने ही जिम्मेदार हमारे अभिभावक भी हैं । ऐसा नही है कि हमारे देश मे मौजूदा समय मे एक भी अध्यापक ऐसा नही है जिसके उदाहरण स्वरूप हम उत्तर प्रदेश राज्य के बाराबंकी जिले के एक प्राथमिक विद्यालय जिसके एक अध्यापक ने अपने स्कूल का जीर्णोधार अपने वेतन से कर बच्चों को पढ़ने का तौर-तरीका अपने ढंग से किया।
अभी हाल ही में बाराबंकी के एक प्राथमिक विद्यालय में एक शिक्षक पर देश ने गर्व महसूस किया क़ि उसने अपने और बच्चों के दम पर स्कूल का कायाकल्प कर दिया, जीर्णषीर्ण अवस्था में स्कूल की बिल्डिंग्स को सरकारी पैसे और अपनी सैलेरी के कुछ पार्ट मिलाकर जिले में बहुत ख़ास बना दिया, स्कूल के बच्चे उस शिक्षक को अत्यधिक प्यार करते थे। ये खबर सोशल मीडिया के जरिये उच्च अधिकारीयों तक पहुंची, इसके बाद उस शिक्षक को सम्मानित किया गया।
इसी तरह केरल में एक शिक्षक ने पढ़ने वाले बच्चों का ऐसा दिल जीता क़ि वह सबकी आँखों का तारा बन गया, दरअसल उस शिक्षक का दूसरे जिले में अधिकारियों ने तबादला कर दिया था, छात्र उसकी जुदाई बर्दास्त न कर सकें और शिक्षक से लिपट कर रो पड़े, और शिक्षक न जाओ के नारे लगाने लगे, खबर सोशल मीडिया पर आग की तरह फ़ैल गयी, मामला उच्च अधिकारियों के संज्ञान में आते ही उस शिक्षक का तबादला स्थगित कर दिया गया।
वास्तव में आज की पीढ़ी को ऐसे शिक्षक की विशेष आवश्यकता है जो बिना किसी स्वार्थ के अपना काम करें, फल तो उन्हें आने वाले समय में मिल ही जायेगा।
दरअसल, आज हमारे विद्यालयों के शिक्षक अपने अध्यापन के कार्यों में ठीक से रुचि ही लेते दिखाई नही पड़ते है। जिसके गहराई में न जाते हुये हमें एक सबसे बड़ी त्रुटी हमारे नौनिहालों को पढ़ाने वाले अध्यापक ही असमर्थ होते है। उनको ही अपने विषय मे अधिक ज्ञान व जानकारियां न होने की वजह से बच्चों का सही मार्गदर्शन नही कर पाते हैं। ऐसे अध्यापकों के हाथों में अपने देश व समाज के आगामी पीढ़ियों के भविष्य निर्माण की जिम्मेदारी सौपना कहाँ तक उचित है। इन्ही अयोग्य अध्यापकों से ज्ञान अर्जित कर जोर जुगत लगा कर सरकारी नौकरी -चाकरी में आने वाले लोग से देश निर्माण एवं देश की जनता के उन्नति के लिए सही काम करने की कैसे आशा की जा सकती है।
- जी क़े चक्रवर्ती







