नास्तिक होना प्रकृति प्रदत्त एक मानवीय गुण है। समाज के किसी कर्म के प्रति उदासीन रहना या उसके प्रति आकर्षित न होना यह उस व्यक्ति का एक गुण कहलायेगा। किसी भी व्यक्ति का ऐसा गुण जिससे समाज के किसी अन्य व्यक्ति प्रभावित न होता हो चाहे उस व्यक्ति द्वारा किसी भी धर्म या विचार को मानने समझने या उसका अनुसरण करने से किसी को कोई फर्ख नही पड़ेगा।
इस दुनिया में पायी जाने वाली अनेकों पदार्थों में से कोई पदार्थ चाहे वह ठोस अवस्था मे जो या द्रव अवस्था मे हो उसका एक गुण- धर्म निश्चित होता है। इसी तरह हम में से कोई बहुत कठोर होता है तो इसके विपरीत कोई व्यक्ति स्वाभावतः बहुत नर्म होता हैं यह तो उस व्यक्ति का गुण है। इसी तरह लोहे का कठोर होना उस पदार्थ का गुण है जोकि प्रकृति प्रदत्त है और चुम्बक के प्रति आकर्षित होना उसका प्रकृति प्रदत्त धर्म है। गुण को हम बदल नही सकते हैं लेकिन धर्म को कुछ आंतरिक परिवर्तन कर बदल सकते हैं जिस प्रकार एक लोहे के अंदर विद्युत प्रवाहीत कर उसे चुम्बक में परिवर्तित कर सकते हैं। लोहा सदैव चुम्बक की ओर आकर्षित होता या चुम्बक हमेशा लोहे को अपनी ओर आकर्षित करेगा न कि लकड़ी को, आज के वैज्ञानिकी युग में शीशे के आंतरिक संरचना में कुछ परिवर्तन कर उसे भी चुम्बक बनाया जा सकता है यह एक अलग बात है लेकिन वह प्रकृति प्रदत्त नही कहलाएगा। इसी तरह हम लोगों के सामाजिक व्यवस्था मे विपरीत लिंगो के मध्य सदैव एक दूसरे के प्रति आकर्षण होना यह गुण दोनो के लिंगों अंदर प्रकृति प्रदत्त है।
किसी भी व्यक्ति का कटु बोलना, झगड़ालू होना किसी के सत्य बोलने की आदत यह सभी हम इंसानों के अंदर पाया जाने वाला एक गुण है जो हम सभी इंसानों में समान रुप से विद्यमान रहता है जैसे देखना, सुनना, खाना, बोलना एक समान है लेकिन किसी का यह धर्म है और हमारे अंदर का धर्म जो हमारे क्रिया कलापों के माध्यम से उजागर होता है। कहने का तातपर्य यह है कि जो जैसा गुणों को धारण किये हुये है उसी सदृश्य व्यवहार भी करेगा लेकिन धर्म को कुछ बदलावो के साथ परिवर्तित किया जा सकता है लेकिन किसी भी चीज के प्रकृति प्रदत्त शुरुआती गुण या दोष को हम चाह कर भी नही बदल सकते हैं, यदि किसी की भी प्रकृति आस्तिक है तो वह हमेशा आस्तिक जैसा व्यवहार करेगा इसके उलट यदि कोई नास्तिक व्यक्ति है तो वह आस्तिकों के ठीक विपरीत नास्तिकता का कार्य करेगा। यहां यह कहना शायद व्यर्थ है कि हमारे संसार मे प्रत्येक चीजों का विपरीत होना प्रकृति का सास्वत नियम है।
नास्तिक होने का अर्थ तर्कशील, स्वतन्त्र-चिंतक एवं विज्ञानवादी होना है। इसके अनुसार ईश्वर को नकारना ऐसे लोगों का स्वभाव है। नास्तिक होने का नैतिकता एवं मूल्यों (कथित अच्छे या बुरे) से कोई लेना-देना नहीं होता है। एक घोर नास्तिक व्यक्ति नियमों का पालन करने वाला आदर्श सामाजिक प्राणी या अपराधी भी हो सकता है। यह ठीक उसी प्रकार से है जिस प्रकार आस्तिकों के विषय में भी यही बात लागू होती है। यद्यपि एक नास्तिक व्यक्ति के तर्कशील होने के कारण उसके द्वारा नैतिक मूल्यों के पालन करने की संभावना दूसरों से अपेक्षाकृत अधिक होगी।
वहीं एक नास्तिक व्यक्ति की राजनैतिक विचारधारा वाम/दक्षिण या कुछ और भी हो सकती है। राजनैतिक विचारों का नास्तिकता एवं आस्तिकता से कोई लेना-देना नहीं होता है। यह कतई आवश्यक भी नहीं कि नास्तिकों की कोई सार्वभौमिक आचार-संहिता हो, या उन्हें किसी भी प्रकार की साझा पहचान या झण्डे तले आने की आवश्यकता हो यदि ऐसा हुआ तो स्वतन्त्र-चिंतन का आधारभूत गुण ही स्वतः नष्ट हो जाएगा।
यहां यह भी जरूरी नही है कि एक नास्तिक व्यक्ति अपने नास्तिकता का प्रचार करें यद्यपि ऐसा करना मानवता के हित में ही होगा लेकिन इसका एच्छिक होना ही श्रेयकर होगा।
व्यक्ति के नास्तिक होने के उपरांत यदि कोई आस्तिकों व धार्मिकों को तुच्छ समझे या उनका उपहास करे तो यह अनुचित बात है। वह भले आस्तिकों से विचार विमर्श करे, लेकिन उनका उपहास कतई न करें।
किसी भी व्यक्ति के नास्तिक हो जाने का अभिप्राय उसका स्वतन्त्र हो जाना है। इस बात पर नास्तिक लोग गर्व भले ही करें किन्तु इस बात पर अहंकार कदापि न करें।
नास्तिको की पहचान मेरे लिये क्या अर्थ रखता हैं। मैन अनेकों को देखा “आहत” हृदयों को देखा कि आव देखा न ताव, बस “नास्तिक” शब्द लिखते या कहते देखा और शब्दों के बाणों की बौछार वर्षा शुरू कर दी! खैर किसी भी व्यक्ति के आस्था की कमजोर नींव पर कुठारा घात होता देख उसका मन का व्यकुल हो जाना स्वाभाविक है।
आस्तिक शब्दावली में यहां यह कहना नितांत जरूरी है कि किसी भी चीज के खोज या सिद्ध करने के लिये हमें सबसे पहले मानना पड़ता है। किसी भी चीज को मानने में उसकी खोज या सिद्ध करने का आधार होता है। शायद हम को आपको अपने पढ़ाई लिखाई के दौरान ज्यामिति के प्रश्नों को हल करते वख्त माना कि a b c एक त्रिभुज है यह मान कर जब हम त्रिभुज को त्रिभुज सिद्ध कर देते हैं वहीं यदि आप कहें कि “माना कि” हम नही मानते है और कियूं माने तो इसका उत्तर पाना या इसे सिद्ध करना शायद अत्यंत ही दुरूह हो जाएगा। – प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती







