आज की शिक्षा प्रणाली और हम

0
358
फोटो: साभार: गूगल

जी के चक्रवर्ती

अभी अभी कुछ ही दिनो पहले हमारे देश के सभी समाचर पत्रो से लेकर दूरदर्शन तक में हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के वार्षिक परीक्षा फल घोषित होते ही बच्चों को बधाइयां देने वालों का तातां लगते दिखाई दिये, किसी को 99 प्रतिशत अंक मिले तो किसी को 95 प्रतिशत और किसी को 90 प्रतिशत ही अंक मिले बच्चे बहुत खुश और हो भी क्यों नही प्रथम श्रेणी में उतीर्ण होने की खुशी किसे नही होगी?

आज के समय हमे यह समझ में नहीं आता है कि प्रत्येक बच्चे को 95 प्रतिशत से अधिक अंक कैसे मिले हैं? इस तरह के परीक्षा फलों ने वास्तव में हमारे समाज मे एक तरह की प्रतियोगिता शुरू कर दी कि कैसे बोर्ड परीक्षा में हम प्रथम आये? चाहे इसके लिये हमे कुछ भी करना पड़े, क्या ये संभव है कि इतने-इतने अंक वो भी बोर्ड कि परीक्षाओं में किसी बच्चे के आएं? आज हमे तो पूरी की पूरी शिक्षा प्रणाली पर ही संदेह होने लगा और वर्तमान समय में दिये जाने वाले शिक्षा प्रणाली पर मन मे अनेकों तरह के सवाल कुलबुलाने लगते हैं कि आखिरकार एक वह भी समय हुआ करता था जब हम लोग पढ़ाई लिखाई करते थे। उस समय ऐसा भी नही था कि होनहार विद्यार्थी नही हुआ करते थे वल्कि उस समय के दौर में 99 प्रतिशत अंक वह भी हाईस्कूल इंटरमीडिएट के बोर्ड परीक्षाओं में असंभव कैसे हुआ करता था, क्यों उस वख्त की हमारी शिक्षण प्रणाली ही दूसरे तरीके की हुआ करती थी इसके अलावा परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच करने वाले परीक्षकों के कापियां जांचने के तौर- तरीके भी अलग हुआ करते थे। दरअसल उस समय परीक्षा की कापियां बहुत सख्ती के साथ जांचा जाता था, तनिक भर भी पाई मात्रा की गलतियां विशेषकर सहित्यतिक विषयों में होता तो उसके नम्बर काट लिये जाते थे।

उसी दर्मियाँ हमारे एक साथी को उत्तर प्रदेश बोर्ड के हाईस्कूल के हिन्दी विषय मे बहुत कम अंक प्राप्त हुये, इस पर उस वह बहुत परेशान था क्योंकि उस विद्यार्थी को अपने ज्ञान पर पूरा इत्मीनान था कि मुझे इतने कम अंक मिल ही नही सकते, इस तरह उसके बार-बार कहने पर उसके हिंदी विषय की कांपी की स्क्रूटनी करने पर यह देखने को मिला कि उसके द्वारा लिखे गये उत्तर में अनेकों जगह अल्प विराम लगा ही नही था और कुछ जगहों पर अर्ध ‘र’ के लिये प्रयोग किये जाने वाले उड़न ‘र’ के स्थान पर पूर्ण र लिखा गया था। इस प्रकार की अशुद्धियां साहित्यिक भाषा के लिखावट मे बहुत बड़ी अशुद्धि मानी जाती है और इस प्रकार की अशुद्धियों पर कांपी जांचने वाले अध्यापक नम्बर काट लिया करते थे, शायद आज के समय मे इस तरह की अशुद्धियों पर ‘अरे चलता है’ कह कर शायद पूरा-पूरा अंक दे देते होंगे लेकिन इससे यही पता चलता है कि चाहे भाषा के स्तर पर बोलने से लेकर लिखने तक मे मोजूदा समय मे लोगों में अनेको प्रकार की बृहद त्रुटियां देखने को मिलती है। इस तरह के परिदृश्य में यही कहना पड़ता है कि हमारे देश की शिक्षा निती में आमूलचूल परिवर्तन लाने की परम आवश्यकता है।

चाहे किसी भी बोर्ड की कंपिया क्यों न हो कांपी जांचने वाले शिक्षक के मस्तिष्क में हमेशा परीक्षार्थी के वावास्तविक ज्ञान को परखने का उद्देश्य हुआ करता था वहीं पर आज का शिक्षा देने और शिक्षा ग्रहण के उद्देश्य ही बदल गये हैं जिसकी वजह से शिक्षण संस्थानों से लेकर शिक्षकों तक केवल नाम और वाह-वाही लूटने तक ही सीमित रह गये है।

जिसमे अरे हमारे स्कूल का नाम होना चाहिये नही तो हमारे स्कूल की अगले वर्ष से सहायता समाप्त कर दी गयेगी अब यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या हमारे समय पढ़ने पढ़ाने वाले विद्यार्थी एवं शिक्षक कम पढ़े लिखे या अयोग्य हुआ करते थे, ऐसा नहीं है और उन्ही अध्यापकों द्वारा परीक्षक के रूप में कापियां भी जांचा जाता था। वहीं पर आज के वख्त येन-केन प्रकारेण जोर जुगत से शिक्षक बन जाते हैं जिसके उदाहरण स्वरूप अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश बोर्ड के अनेक शैक्षिक संस्थानों में नकली सर्टिफिकेट लगा कर बने शिक्षक बच्चों को पढ़ाते दिखाई दिये ऐसे लोगों की धड़- पकड़ भी हुई यह तो कहिये कि ऐसे शिक्षक पकड़े गये लेकिन शायद न जाने और भी कितने शिक्षक अभी पढ़ा रहे होंगे जो लोग इस तरह की धड़-पकड़ से दूर हैं कमोवेश यही हालात चाहे वो सीबीएसी बोर्ड हो या आईसीएसी हो या उत्तर प्रदेश बोर्ड हो कमोवेश लगभग यही दशा सभी बोर्डो की है।
कोरोना वायरस महामारी से पैदा हुई असाधारण परिस्थितियों की बजह से सीबीएसई एवं सीआईएससीई बोर्ड के साथ-साथ देश के लगभग हर राज्यों के बोर्डो ने इस वर्ष कक्षा 10 एवं कक्षा 12 के परिणाम घोषित कर दिये थे।

हमारे देश के स्कूलों एवं अन्य शिक्षण संस्थानों के जिम्मेदार लोगों को यह बात ध्यान में अवश्य रखना होगा कि आज के इस ओद्योगिक एवं प्रतियोगी युग में नियोक्ताओं को प्रतिभाओं की तलाश रहती हैं न कि टॉपर्स लोगों की प्रत्येक नियोक्ताओं की अपने संस्थान में भर्ती के मापदंड किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करते हैं जिसमें दृढ़ संकल्प, दूसरों के साथ काम करने की क्षमता, कौशल का सही प्रयोग के साथ ही साथ एक अत्यंत कठिन परिश्रम करने वाला हो।

अब यहां यह प्रश्न उठना लाजमी है कि यदि ऐसे शिक्षकों द्वारा हमारे देश के भविष्य कहलाने वाले नौनिहालों की प्रारम्भिक शिक्षा ऐसे अधयापकों के कंधो पर होगी तो बच्चे बड़े होकर यदि किसी शैक्षिक संस्थान के अध्यापक बनेंगे तो हम इस बात का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि ऐसे लोगो के द्वारा पढ़ाये गये बच्चों का भविष्य कैसा होगा?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here