वैज्ञानिक नाम्बी नारायण को लगभग ढाई दशक बाद न्याय का मिलना लगभग न मिलने के बराबर है। वह भी तब, जब किसी मामले में साजिश के तहत फंसाया किसी व्यक्ति को ढाई दशक तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के पश्चात अदालत द्वारा उसे निर्दोष करार देते हुए बाइज्जत बरी किया जाता है। तब यही एक सवाल उठता है कि क्या इसे वास्तव में न्याय कहां जाएगा। क्योंकि देर से मिला न्याय भी एक तरह का अन्याय ही कहा जाता है। ऐसा ही एक मामला इसरो जासूसी कांड का है जिस में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व अंतरिक्ष वैज्ञानिक नाम्बी नारायण को बरी कर दिया है।
अदालत ने स्पष्ट कहा है कि जासूसी कांड में इस वैज्ञानिक की कोई भूमिका नहीं थी और वह पाक साफ है। अदालत का यह फैसला नाम भी नाम्बी नारायण के लिए बड़ी राहत तो जरूर है लेकिन इस विडंबना को क्या कहें कि उन्हें खुद को पाक साफ साबित कर न्याय पाने में जीवन के महत्वपूर्ण 24 साल निकल गए। अपने माथे पर थोपे गए जासूसी के कलंक को हटाने के लिए पूरे ढाई दशक जिस मानसिक वेदना से उन्हें गुजरना पड़ा, क्या उसकी भरपाई का कोई उपाय हो सकता है? क्या मुआवजे के रुप में मिली रकम ढाई दशक तक लगातार चली गई वेदना का समुचित उपचार साबित हो सकती है, बिल्कुल नहीं?
हां इस निर्दोष वैज्ञानिक को इतना संतोष जरूर हुआ होगा और उम्मीद भी बंधी होगी कि जिन लोगों ने उन्हें फंसाया। अब उन्हें सजा जरूर मिलेगी। बता दें कि इसरो जासूसी कांड 1994 में सामने आया था, जब मालदीव की एक महिला के पास से इसरो अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज बरामद हुए थे। यह दस्तावेज क्रायोजेनिक इंजन परियोजना के थे। नाम्बी नारायण तब इस परियोजना के प्रमुख थे। महिला की गिरफ्तारी के पश्चात नाम्बी नारायण दो अन्य के साथ और एक महिला को गिरफ्तार किया गया था।
इसकी जांच पुलिस ने अपनी तरह की और नाम्बी नारायण पर गोपनीय दस्तावेज पाकिस्तान को बेचने का आरोप लगाया। मामला सीबीआई को गया तो सीबीआई को कोई सबूत नहीं मिला और निचली अदालत से सारे अभियुक्त बरी कर दिए गए।
इस जासूसी कांड ने केरल की राजनीति में ऐसी हलचल मचाई कि राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था। यह पूरा घटनाक्रम पुलिस की करतूतों का खुलासा करता है। जिसके कारण एक होनहार प्रतिभावान वैज्ञानिक को अपनी जिंदगी का बेशकीमती लंबा समय कानूनी लड़ाई के हवाले करना पड़ा। अब आगे क्या होगा जांच की आंच कहां तक पहुंचेगी। यह तो भविष्य ही बताएगा लेकिन इतना जरूर है कि हमारे देश के एक वैज्ञानिक के साथ जो हुआ उसका सबसे ज्यादा नुकसान तो हमारे देश का ही हुआ है।







