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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    बसपा के आधार को कमजोर करेगा यह सौदा

    By March 5, 2018Updated:March 5, 2018 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    पूर्वोत्तर में आए सियासी भूकंप के झटके लखनऊ, गोरखपुर और फूलपुर तक महसूस किए गए। तत्काल आपदा प्रबंधन की कवायद शुरू हो गई। जिन क्षेत्रीय पार्टियों का पूर्वोत्तर राज्यों से कोई लेना देना नहीं था, उन्होंने भी अपनी जड़ों को हिलते देखा। यह पहला राजनीतिक भूकम्प होता तो गनीमत थी लेकिन यह त्रासदी तो पिछले लोकसभा चुनाव से चल रही है। अपनी अपनी पार्टियों को भूकंपरोधी बनाने के प्रयास किये गए। कभी नोटबन्दी कभी ईवीएम गड़बड़ी के मुद्दे का प्रयोग किया गया, लेकिन जिसे रोकना चाहते थे, वह बढ़ता ही जा रहा है। अब तो अस्तित्व पर संकट दिखने लगा है। सपा और बसपा की जुगलबंदी के यही स्वर है।
    बिडंबना देखिये,  मायावती ने कभी सपा पर गड़बड़ी का आरोप लगा कर उप चुनाव कभी न लड़ने का फैसला किया था।उनका कहना था कि सपा उपचुनाव में गड़बड़ी करती है। लेकिन आज वही मायावती सपा को समर्थन देंगी। आज बबुआ और बुआ की मधुर व्याख्या हो रही है। जबकि मायावती और अखिलेश यादव ने बिना तंज और व्यंग के इन रिश्तों का कभी  नाम नही लिया। अखिलेश कहते थे बुआ जी से सावधान रहना, मायावती कहती थी कि मुलायम का बबुआ मारा मार घूम रहा है। अखिलेश सावधान किसी और को कर रहे थे, अब खुद समर्थन की नौबत आ गई। जो मायावती की मूर्तियों पर बुलडोजर चलाने की बात करते थे, मायावती उन्हें समर्थन देंगी।
    चर्चा तो समर्थन और समझौते की थी। कहा जा रहा था कि गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में बसपा का समर्थन सपा को मिलेगा। लेकिन जो तस्वीर सामने आई ,उसे समर्थन या समझौते की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।  यह विशुद्ध सौदा है।  मायावती ने इसे  छिपाया भी नहीं ।  यह भी  इस सौदे में आपसी विश्वास के लिए कोई जगह नहीं है।  मायावती आज भी सपा पर विश्वास करने को तैयार नहीं है। इसीलिए उन्होंने कहा कि राज्यसभा और विधानपरिषद चुनाव में  एक दूसरे को दिए जाने वाले वोट  पार्टी एजेंट को दिखाने होंगे।  मतलब गोरखपुर और फूलपुर में समर्थन की यह कीमत होगी।  इसी पर भविष्य की सौदेबाजी निर्भर होगी।  वैसे मायावती अपने ही निर्णय से कब पलट जाए , इसे कोई नहीं जानता। सपा से सौदा भी एक प्रकार की पलटी मारना है। अन्यथा मायावती लखनऊ गेस्टहाउस कांड कभी भूल नहीं सकती। तब भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने अपनी जान जोखिम में डालकर मायावती की जान बचाई थी। मायावती की जगह कोई और होता तो इस  अहसान को सदैव स्मरण में रखता। भाजपा नेता ने मायावती की केवल जान ही नही बचाई थी, बल्कि उनका राजनीतिक जीवन भी बचाया था। भाजपा ने उन्हें तीन बार मुख्यमंत्री बनाया। इससे उनकी राजनीतिक हैसियत बढ़ गई थी। अन्यथा बसपा किसी अन्य राज्य में अस्तित्व नही बना  सकी । भाजपा के साथ अल्पमत सरकार चलाने के दौरान मायावती की जो छवि बनी थी, उसी का लाभ उन्हें 2007 के विधानसभा चुनाव में मिला था। तब वह पूर्ण बहुमत से  सरकार बनाने में सफल हुई थी लेकिन अकेले  सरकार चलाने के दौरान उनकी वह छवि धूमिल हो गई, जो भाजपा के साथ सरकार चलाने के दौरान बनी थी ।
    मतलब साफ है, गेस्टहाउस में मायावती का जीवन बचाने वाली भाजपा थी, उन्हें तीन बार मुख्यमंत्री बना के राजनीतिक जीवन देने वाली भाजपा ही थी। इस कारण मायावती का फायदा हुआ।। जबकि भाजपा को बहुत नुकसान हुआ।  डेढ़ दशक तक भाजपा को उत्तर प्रदेश के मुख्य मुक़ाबले  से भी बाहर रहना पड़ा। 2014 में नरेंद्र मोदी के करिश्मे के बाद ही  भाजपा इस त्रासदी से निकल सकी थी। फिर भी बिडंबना देखिये मायावती आज कह रही है जो भाजपा को हराएगा, उसे समर्थन देंगी। जबकि उनकी पार्टी खुद चुनाव नहीं लड़ रही है। मायावती को तीन बार मुख्यमंत्री बनाने वाली पार्टी दलित वीरोधी कैसे हो सकती है। मायावती को यह भी बताना चाहिए कि जिस पार्टी को  वह समर्थन दे रही है, वह दलितों की हितैषी कब से हो गई । इस संबन्ध में किसी अन्य के आरोप पर चर्चा की जरूरत नहीं है।  खुद मायावती सपा के बारे में जो कहती थी ,  वही याद कर लें। मायावती की उन बातों को सच कहें, या आज जो सौदेबाजी हो रही है ,  वह  सच्ची है।   दूसरी ओर मुलायम को भी यह दिन देखना था। 1993 में बसपा के साथ सरकार चलाने के दौरान उन्हें अपमान के घूंट पीने  पड़े थे। मुलायम उन लम्हों को कभी  भूल नहीं सकते। आज उनकी पार्टी उत्तराधिकार में जा चुकी है। उनका कोई जोर नहीं रहा लेकिन मायावती के साथ चल रहा सौदा उन्हें व्यथित अवश्य कर रहा होगा।
    मायावती और उनके भाई आनंद को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता।  वह जमीन से बहुत ऊपर उठ चुके है। लेकिन आम दलित ने एक चौथाई शताब्दी तक सपा की ओर से  जमीनी बेरुखी झेली है। आज मायावती कह रही है  की जो भाजपा को हराये, उसे बसपा के लोग वोट दे। मतलब वह उसी सपा को वोट देने का निर्देश दे रहीं है,जो उन्हें अपनी सत्ता के समय उपेक्षित किये हुए थे। यह बात मायावती ही सपा शासन में बार- बार उठाती थी। आज वही  मायावती फरमान जारी कर रही है कि सपा को वोट दे। यह कहने का दूसरा कोई मतलब भी नहीं जो भाजपा के खिलाफ मजबूत दिखे उसे वोट दे। बसपा का अब तक मतदाता रहे लोग भी वास्तविकता समझ रहे है।
    मायावती का यह फरमान बसपा के वोटबैंक को विभाजित करेगा। सपा शासन में  जिन्होंने जलालत झेली है, वह मायावती के मनमाने फैसले के साथ नहीं रहेंगे। मायावती को यह समझना होगा कि अब तीन दशक वाली स्थिति नहीं है। तब मायावती अपना वोटबैंक दूसरी पार्टी में ट्रांसफर  कराने की हैसियत में थी। अब मायावती के वोटबैंक में पहले जैसा समर्पण नही रह। एक बड़ा वर्ग भाजपा और नरेंद्र मोदी पर विश्वास करने लगा है। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में इस वर्ग ने भाजपा का समर्थन किया था। भाजपा की भारी जीत और बसपा की बदहाली में इनका योगदान भी कम नही है। राजनीति में अस्तित्व बचना अपरिहार्य होता है। लेकिन बसपा ने जो तरीका चुना उससे नुकसान ही ज्यादा होगा। फिलहाल तो एक राज्यसभा सीट के लिए अपने मतदाताओं को सपा के समर्थन का सन्देश  भ्रम की स्थिति बना रहा है।
    नरेंद्र मोदी ने डॉ भीमराव अंबेडकर से जुड़े पांच तीर्थो को भव्य स्मारक का रूप दिलाया। दलितों के आर्थिक विकास हेतु विशेष योजनाये बनाई। अनेक विशेष प्रावधान  किये। इन सबका सकारात्मक प्रभाव हुआ है। मायावती का  सपा को समर्थन का फरमान उनके धरातल को कमजोर बना देगा।
    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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