फिर खेला होबे क्या ?

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पांच राज्यों के नतीजों के उलटफेर से चिंता ?

पांच राज्यों के नतीजे सामने है और माथे पर शिकन एक बार फिर बढ़ गयी हैं। क्योंकि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव अपने आप में अभूतपूर्व कहे जा सकते हैं। इनके नतीजों का अनुमान भी राजनीतिक विश्लेषकों ने लगाया था और वे काफी कुछ सही भी हुए हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव में जो तीखापन था, वह हाल के चुनावों से कहीं ज्यादा था और उसके अलग-अलग निहितार्थ भी निकाले जा रहे थे। यह तो पहले से ही तय था कि टक्कर कांटे की होगी लेकिन परिणामों ने यह टक्कर और भी बढ़ा दी है। सच तो यह है कि ये चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था और इसीलिए इसका तीखापन भी बढ़ गया था।

यही कारण है कि कोरोना की लहर होने के बाद भी खुद जनता बड़ी तादाद में अपने नेताओं को सुनने के लिए आती रही थी। यह बात और है कि इसी कारण राज्य में कोरोना प्रभावितों की संख्या बढ़ गई है। ऐसा ही एक और प्रतिष्ठा का चुनाव असम का था जहां भाजपा की सरकार है। वहां कांग्रेस के महाजोत गठबंधन से उसका मुकाबला था और उसकी स्थिति भी काफी अच्छी मानी जा रही थी। इन दोनों राज्यों में मतों के ध्रुवीकरण का प्रयास भी काफी बड़े पैमाने पर सभी पक्षों द्वारा किया गया।

तमिलनाडु में नतीजा आशा के अनुरूप ही रहा है जहां द्रविड़ मुनेत्र कजगम करीब दस साल बाद सत्ता में आई है। यहां के चुनाव में सत्ता विरोधी रुझान का खासा असर देखने को मिला। वहीं, इससे सटे राज्य केरल में वाम मोर्चे का एलडीएफ एक बार फिर सत्ता में आकर रिकार्ड तोड़ गया। अभी तक इस राज्य में एक पार्टी या मोर्चे का दोहराव नहीं होता था। इस लिहाज से इस चुनाव को असाधारण रुझान का माना जा सकता है। इससे यह भी पता चलता है कि राज्य में वाम मोर्चे की सरकार की स्वीकार्यता बरकरार है। पुडुचेरी में जो नतीजा आया है, उसे अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता। हालांकि कुछ लोग इससे उलट विचार प्रकट कर रहे थे लेकिन वैसा नहीं हुआ। फिलहाल इन चुनाव नतीजों को दिलचस्प कहा जा सकता है।

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