- जी के चक्रवर्ती
फिलहाल पश्चिम बंगाल में प्रथम चरण का मतदान 27 मार्च को होने वाला है जिसे लेकर यहां के चुनावी मैदान में टीएमसी से लेकर बीजेपी और अन्य पार्टियों के चुनावी चेहरे में चाहे वह समृति ईरानी हो या कोई अन्य यहाँ पर किसी अन्य पार्टी के चेहरे को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ सकता है क्योंकि यहां पर सब कुछ दीदी यानिकि ममता बनर्जी के रंग में रंगा हुआ प्रतीत होता है। यह प्रकृति प्रदत्त आदत है कि एक महिला के प्रति कहीं न कहीं नर्मियत अवश्य रखती है और ऊपर से ममता ने पिछले 10 वर्षों में पश्चिम बंगाल में जमीनी स्तर पर बहुत से अच्छे कार्य भी किये हैं, जिसका प्रभाव भी इस चुनाव पर अवश्य पड़ेगा, लेकिन यहां इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता है कि एक व्यक्ति सभी जनता को खुश नही कर सकता है, लेकिन यदि हम यहां पर केवल महिला मतदाताओं की बात करें तो ताजे मतदाता सूची के अनुसार इस राज्य में लगभग 7 करोड़ 18 लाख मतदाताओं में से 3 करोड़ 15 लाख यानिकि करीब 49 प्रतिशत महिला मतदातायें हैं।
यहां के लोगों की पहली पसंद टीमसी पार्टी के प्रमुख की है। यहां पर राजनीतिक हालात, मुद्दों और चेहरों की जंग में बंगाल में तृणमूल विपक्षी दलों की पहली पसंद है। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में है, यहां भाजपा की मुख्य लड़ाई भी तृणमूल से है, जिसके कारण पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के 10 मार्च 2021को नंदीग्राम से नामांकन करके सड़क के रास्ते लौटते समय उनपर हुये हमले में उनके पैर गर्दन में लगी चोट लगने से यहां की सियासत गर्मा गयी है।
बीजेपी के लोगों का कहना है कि वे नाटक कर रही है खैर यह तो जांच का विषय है लेकिन उन पर हुये इस तरह के हमले से यह तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि विपक्षी दलों की राजनीतिक रणनीति इससे अवश्य घायल हुई है। इस प्रकार के कारनामे कुंठित राजनीति का ही परिचयक है। यहां पर यह प्रश्न उठना भी लाजमी है कि आखिरकार कोई भला अपने आप को जानबूझ कर चोटिल कियूँ करेगा। इस दुःखद घटना क्रम में अब पश्चिम बंगाल में राजनीति परिदृश्य बहुत तेजी से बदल रहे हैं।
अब एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि पूरे देश मे होने वाले इन विधानसभा चुनावों में कहीं न कहीं ओछी, हिंसात्मक राजनीति करने में भी पार्टियां गुरेज नही करेगी।
अभी विपक्ष टीएमसी के प्रमुख पर यह आरोप भी लगा है कि उन्होंने चुनाव के वख्त अपने आपको चोटिल करके इस घटना के माध्यम से जनता की हमदर्दी बटोरने की कोशिश किया है, लेकिन इस तरह की अनर्गल बातों से पश्चिम बंगाल के वोटरों की मानसिकता पर कोई प्रभाव नही पड़ने वाला है। पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार बनेगी यह तो आने वाला वख्त दूध का दूध पानी की पानी करने में सक्षम है। लेकिन पार्टियां भी राजनैतिक जीत को लेकर कोई कोर कसर अपने स्तर बाकी नहीं रखना चाहती हैं। अब देखते ऊंट किस करवट बैठता है।







