सिनेमा की सार्थकता और बेचारा दर्शक!

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हेमंत पाल

किसी भी फिल्म को देखने से पहले जहन में एक सवाल उठता है कि इस फिल्म को क्यों देखा जाए? ऐसा क्या है इस फिल्म में जो पिछली किसी फिल्म में नहीं था! लेकिन, इस तरह के सवालों का कोई तार्किक जवाब शायद ही किसी दर्शक को कभी मिला हो! क्योंकि, आज फिल्म देखने के पीछे सिर्फ टाइम पास या हल्के-फुल्के मनोरंजन की धारणा ही बची है। आजादी से पहले या आजादी के बाद की स्थितियां भी नहीं बची, जब फिल्म देखने के पीछे कोई मकसद हुआ करता था। आज का सिनेमा न तो कोई राह दिखाता है न दिमाग में घुमड़ते किसी सवाल का जवाब ही देता है। जमाना जिस तेजी से बदल रहा है सामाजिक, राजनीतिक, घटनाओं और तनावों पर बन रही फिल्मों से भी कुछ सीखने को मिलता हो, ऐसा कभी नहीं लगा।

हर फिल्म का केंद्रीय पात्र उसका हीरो होता है, जिसके बारे में ये धारणा बन चुकी है कि वह हमेशा ही आदर्शवाद और सत्यवादिता का प्रतीक है! पर क्या वास्तव में ऐसा होता है? आज ऐसे कई फ़िल्मी नायक हैं, जिनका नायकत्व सिर्फ परदे तक ही सीमित है। असल जिंदगी में वे परदे के खलनायक से बदतर होते हैं। इसलिए फिल्म देखने का ये ठोस कारण भी नजर नहीं आता। मुख्यधारा के सिनेमा को जितना सार्थक और यथार्थपरक दिखाने की कोशिश की जाती है, वो दर्शक के मन मस्तिष्क में हलचल पैदा नहीं। क्योंकि, आज की फिल्मों में गंभीर मुद्दों का सतहीकरण किया जाता है और सतही बात के प्रति गंभीरता दिखाई जाती है। इस बात से इंकार नहीं कि आज जटिल मसलों और राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर फिल्में नहीं बन रही! लेकिन, ये फ़िल्में अपने कंटेंट से लेकर ट्रीटमेंट तक दर्शकों को उस हद तक प्रभावित नहीं कर पाती, जो सोचकर उन्हें बनाया जाता है।

फिलहाल जो फ़िल्में बन रही हैं वे कहानी के मूल विषय से जल्दी भटक जाती हैं। फिर उनके पास वही फॉर्मूले बचे रह जाते हैं, जिनसे मसालेदार सिनेमा बनता है। भ्रष्ट अफसर या नेता को पीटकर नायक अपनी दिव्यता से दर्शक की तालियां और नायिका को अभिभूत तो कर लेता है, पर ये सवाल जिंदा ही बचता है कोई नायक के विपरीत खलनायक बनने पर मजबूर क्यों हो जाता है? भ्रष्टता, साजिशें और चारित्रिक पतन किसी में जन्मजात नहीं होता, फिर खलनायक और नायक में विभेद कैसे होगा? क्या फिल्मकारों का दायित्व नहीं कि वे फकत मनोरंजन से दो कदम आगे बढ़कर कुछ सवालों के जवाब ढूंढे और उसे अपनी फिल्म का विषय बनाएं?

कुछ फिल्मकार दर्शकों को बौद्धिकता का झांसा देकर किसी ज्वलंत मुद्दे को परदे पर दिखाने साहस तो करते हैं, पर जब भी जेनुइन सिनेमा की बात होती है तो वे कन्नी काट जाते हैं। तब उन्हें फिल्म का बिजनेस याद आता है और अपनी फिल्म को सौ करोड़ क्लब में शामिल कराने की ललक उनसे वो सब करवाने को मजबूर कर देती है, जो शायद वे दिल से न करना चाहते हों! विडंबना ही है कि अपनी फिल्मों की तुलना करने के लिए हम हॉलीवुड को कसौटी मानते हैं, पर हमारा ये भ्रम दूर नहीं होता कि दुनिया में कहीं और हमारे जैसा सिनेमा है ही नहीं!

राजनीति और अपराध जगत की फिल्में ही हमारे यहाँ ज्यादा बनती और पसंद भी की जाती है। क्योंकि, वे किसी आपराधिक चरित्र का महिमा मंडन ज्यादा करती हैं। ये फ़िल्में कहीं भी अपराध पर वैचारिक चोट नहीं करती और न उसे चुनौती देती हैं। ऐसी स्थिति में ‘नो वन किल्ड जेसिका’ और ‘नीरजा’ जैसी सार्थक फ़िल्में असमंजस के चंगुल में फंसकर रह जाती है। फिल्मकार समझ नहीं पाता कि यदि उसे महिलाओं पर हिंसा की भयावहता दिखाने की जरुरत पड़े तो वो उसे किस रूप में दर्शकों के सामने पेश करना चाहिए? हमारा सिनेमा उनके लिए कोई सार्थक पहल कर रहा हो, ऐसा कहीं नजर नहीं आ रहा! आएगा भी नहीं, क्योंकि बॉक्स ऑफिस का सौ करोड़ क्लब का लालच बढ़ते क़दमों को रोक जो देता है। आखिर धंधे में कोई जोखिम क्यों उठाए?

साभार

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