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    Home»Featured

    सिविक सेंस: वो ‘खोई हुई चिड़िया’ जो भारत की उड़ान को रोक रही है!

    ShagunBy ShagunJanuary 19, 2026 Featured No Comments3 Mins Read
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    Civic sense: The 'lost bird' that is hindering India's progress!
    सिविक सेंस
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    करियर की दौड़ में सामाजिक जिम्मेदारी भूल गए हम? जागो, क्योंकि बदलाव आपसे शुरू होता है

    (शगुन न्यूज़ इंडिया): कल्पना कीजिए- एक चमचमाती दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर कोई व्यक्ति खुले में पेशाब कर रहा है, वीडियो वायरल हो रहा है, और लोग सिविक सेंस की कमी पर गुस्सा जता रहे हैं। या फिर सड़क पर कचरा फेंकना, लाइन तोड़ना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना- ये रोज की बातें बन गई हैं।

    लेकिन क्या आप जानते हैं? ये सब ‘सिविक सेंस’ नाम की उस चिड़िया की कमी से है, जिसे हम परिवार, समाज और स्कूलों से सीखते थे। आज करियर, जॉब, डिग्री पर इतना फोकस है कि बच्चों को सामाजिक दायित्व, सार्वजनिक जगहों पर व्यवहार और जिम्मेदारी सिखाना ‘एक्स्ट्रा’ लगने लगा है।

    Civic sense: The 'lost bird' that is hindering India's progress!
    सिविक सेंस जरुरी है

    नतीजा? सड़कें गंदी, ट्रैफिक अराजक, और समाज में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है।

    सिविक सेंस क्या है? और क्यों ये ‘करियर’ से ज्यादा जरूरी है?

    सिविक सेंस मतलब नागरिक भावना- सार्वजनिक जगहों पर सम्मान, नियमों का पालन, दूसरों की सुविधा का ख्याल। ये कोई किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें हैं:

    • कचरा डस्टबिन में डालना
    • लाइन में खड़े रहना
    • थूकना या गंदगी फैलाना नहीं
    • ट्रैफिक नियम मानना
    • शोर न मचाना

    लेकिन भारत में ये कमी क्यों?

    क्योंकि हम बच्चों को सिर्फ IIT, MBA, अच्छी सैलरी सिखाते हैं। सामाजिक जिम्मेदारी? वो स्कूल के सिलेबस से गायब है। परिणामस्वरूप, शिक्षित लोग भी सड़क पर थूकते हैं, गाड़ी पार्किंग में गलत जगह लगाते हैं, और सार्वजनिक संपत्ति को ‘सरकार की चीज’ समझकर तोड़ते हैं।

    असली उदाहरण जो हंसाते भी हैं और रुलाते भी

    दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर खुले में पेशाब का वीडियो वायरल- लोग कह रहे हैं, “सिविक सेंस की धज्जियां उड़ गईं!”
    PM मोदी के दौरे के लिए सजाए गए शहर में लोग फूलों के गमले चुरा ले जाते हैं।
    Vande Bharat ट्रेन में कुछ लोग बेहतरीन व्यवहार दिखाते हैं, लेकिन ज्यादातर जगहों पर अराजकता।
    विदेशी शख्स महाराष्ट्र में बाइक सवारों को ट्रैफिक नियम सिखाते हुए, क्योंकि हमें खुद नहीं पता!

    ये सिर्फ ‘गंदगी’ नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता दिखाते हैं:

    “पब्लिक है तो मेरी नहीं।

    “समस्या की जड़ें:

    करियर फोकस ने ‘सेंस’ को मार डाला
    शिक्षा में सिर्फ नंबर और जॉब पर जोर।
    परिवार में “बस पढ़ाई करो, बाकी बाद में” वाली सोच।
    इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी (डस्टबिन न होना) और सजा का डर न होना।
    ओवरक्राउडिंग से ‘सरवाइवल मोड’ सब सोचते हैं, “मैं क्यों सुधारूं?”

    नतीजा?

    जीवन भर अनभिज्ञ रह जाते हैं। प्रतिरोध करने पर खुद को नुकसान, क्योंकि सिविक सेंस उनमें नहीं।

    आसान बदलाव: आज से शुरू करें, बच्चों को सिखाएं

    घर से शुरू:

    बच्चे देखते हैं तो सीखते हैं-
    कचरा डस्टबिन में डालें, लाइट बंद करें।

    स्कूल में विषय जोड़ें:

    • सिविक सेंस को मुख्य सिलेबस में शामिल करें, जैसे मैनर्स और जिम्मेदारी।
    • जागरूकता अभियान: #CivicSenseIndia जैसे हैशटैग से सोशल मीडिया पर चलाएं।
    • सख्ती + इनाम: जुर्माना लगे, लेकिन अच्छे काम की तारीफ भी हो।
    • इंदौर जैसे शहरों ने कम्युनिटी से साफ-सफाई का रिकॉर्ड बनाया।
    • छोटे कदम: लाइन में खड़े हों, थूकें नहीं, नियम मानें, ये छोटे बदलाव बड़े असर डालते हैं।

    अंत में: एक क्लिक नहीं, एक आदत बदलाव लाएगी

    सिविक सेंस कोई फैशन नहीं, बल्कि देश की नींव है। अगर हम बच्चों को सिर्फ करियर सिखाएंगे, तो सड़कें वैसी ही रहेंगी। लेकिन अगर जागरूक होंगे, तो भारत साफ, अनुशासित और मजबूत बनेगा। आपका एक कदम—पूरे मोहल्ले का बदलाव!
    क्या आपने कभी सिविक सेंस से जुड़ी अच्छी कहानी देखी? @Shagunnewsindia पर शेयर करें। जागो भारत, सिविक सेंस अपनाओ!

    Shagun

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