सीएसआईआर: केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) में आयोजित “आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण औषधीय एवं सगंध फसलों के उत्पादन एवं प्रसंस्करण “ विषय पर कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम
सीएसआईआर- केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप), लखनऊ द्वारा तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं विशेष व्याख्यान माला का आज जिरेनियम मिंट आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन डा अब्दुल समद निदेशक, सीमैप के कर कमलों द्वारा किया गया। डा आलोक कालरा ने एरोमा के राष्ट्रीय स्वरूप के बारे में बताया।
कार्यक्रम के संयोजक डा आलोक कृष्णा और डा सौदान सिंह ने बताया कि जिरेनियम और मिंट की उत्तर भारत में व्यावसायिक स्तर पर करने की सलाह दी और उनकी प्रौद्योगिकी के बारे में बताया।
प्रशिक्षण कार्यक्रम मे 13 राज्यो से आए हुये 100 किसान एवं उद्घमियों ने भाग लिया, जिसमें मुख्यत: उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, हिमांचल प्रदेश, राजस्थान एवं तेलंगाना इत्यादि राज्यो से प्रतिभागियों ने विशेष व्याख्यान माला में भाग लिया और उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के 150 जिरेनियम की खेती कर रहे किसानों ने भी भाग लिया। जिरेनियम की माँग प्रतिवर्ष 120-130 टन है और भारत में उत्पादन सिर्फ 1-2 टन होता है। अत: माँग को देखते हुये जिरेनियम की खेती उत्तर भारत में की जा सकती है। इससे किसानों की आय दुगुनी की जा सकती है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रमुख डा आलोक कृष्णा ने कहा कि औषधीय एवं सगंध पौधो की व्यवसायिक एवं जैविक खेती से तीन गुणी आय की जा सकती है उन्होने कृषि वानिकी तथा वर्मीकोंपोस्टिंग द्वारा जैविक खेती को बढावा देने पर ज़ोर दिया।
और यह भी अवगत कराया कि बंजर एवं बेकार पड़ी भूमि में लेमनग्रास, पामारोशा, और खस की खेती सरलता से की जा सकती है और हजारों किसानों को रोजगार दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त बागवानी क्षेत्र में कालमेघ, सर्पगंधा की खेती की जा सकती है ।






