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    Home»करियर»Education

    सुषमा स्वराज बनाम शशि थरूर: संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी

    By January 25, 2018 Education 3 Comments8 Mins Read
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    अनुराग चौधरी 
    संयुक्त राष्ट्र संघ में इस समय छः अधिकारिक भाषा (OFFICIAL LANGUAGE) और दो कार्यकारी भाषा (WORKING LANGUAGE) है भारत सरकार चाहती है सातवीं अधिकारिक भाषा हिंदी हो। इसी विषय पर भारतीय संसद में गर्मागर्म बहस हुई।

    हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकारिक भाषा बनाना चाहिए या नहीं भारत राष्ट्र का कितना फायदा व नुकसान होगा।

    संयुक्त राष्ट संघ में हिंदी अधिकारिक भाषा होनी चाहिए इस विषय पर चर्चा में संसद में विदेशी मामले कि मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा की हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) में अधिकारिक भाषा बनाने के लिए सिर्फ प्रक्रियात्मक (PROCEDURAL) बाधा है वित्तीय बाधा नही है अगर वित्तीय समस्या आती है तो भारत सरकार वहन कर लेगी, प्रक्रियात्मक बाधा इसलिए क्योंकि संयुक्त राष्ट संघ में 2/3 देशों का समर्थन चाहिए होगा।

    हिंदी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है और भी देश हैं जहाँ हिंदी बोली जाती है जैसे फिजी, मारीशस, ट्रिनीदाद, टोबागो, सूरीनाम और अरब देश भी शामिल है।

    सुषमा स्वराज ने कहा जहाँ-जहाँ प्रवासी भारतीय है वहां भी हिंदी भाषी लोग मिलेंगे और आज विश्व में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी है ये सब हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकारिक भाषा बनाने के अच्छे आधार है।

    संयुक्त राष्ट्र संघ में अभी छः अधिकारिक भाषा है जिसमे शामिल है अराबिक, अंग्रेजी, फ्रेंच, मंडारिन, रुसी व स्पेनिश और दो कार्यकारी भाषा अंग्रेजी व फ्रेंच हैं।

    2007 जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तभी से संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को अधिकारिक भाषा बनाने की कोशिस की गयी थी, UPA सरकार ने उसी समय ही जमकर मुहीम चलाई थी हिंदी को अधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने की, उस समय मनमोहन सिंह की राजनयिक मित्रता जगजाहिर थी।

    2015 में नेपाल के उप राष्ट्रपति परमानन्द झा ने हिंदी को अधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाने का समर्थन किया था। हिंदी को अधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाने का भारत सरकार का बहुत ही लम्बे समय से एजेंडा रहा है।

    प्रथम विश्व युद्ध व द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी भारत ने किसी भी गुट का समर्थन नही किया था जिससे भारत की राजनयिक मित्रता अच्छी है जिससे हिंदी को अधिकारिक भाषा बनने का रास्ता साफ दिख रहा है।

    हिंदी को अधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाने के लिए भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ के 193 सदस्य देशों में 2/3 देशों का सहयोग चाहिए, जिसमे 2/3 देशों के समर्थन से सामान्य सभा (GENERAL ASSEMBLY) में एक रेजोल्यूशन (RESOLUTION) पास करवाना होगा जिसमे भारत को 129 देशों का साथ चाहिए। भारत कि नम्र शक्ति (SOFT POWER)विश्व स्तर पर बहुत अच्छी है और बहुत सारे देशों में भारत का प्रभाव भी है जिससे रेजोल्यूशन पास हो जायेगा।

    अगर हिंदी को अधिकारिक भाषा का दर्जा मिलता है तो बहुत सारे गरीब देशों को इसका खर्चा उठाना पड़ेगा जिसके लिए भारत सरकार पहले ही 400 करोड़ रुपया प्रति वर्ष देने के लिए तैयार है। गरीब देशों का  अनुवादक (TRANSLATOR) व कागज खर्चा बढ़ने के आसार हैं अनुमान है की 50 करोड़ से कम का ही खर्चा आएगा।


    तो क्या उन्हें UN में मजबूरी में खड़े होकर हिंदी में ही बात करनी होगी: थरूर

    जब लोकसभा में चर्चा हो रही थी संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को ले जाने के मामले पर तो कांग्रेस के तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने कहा  “अगर कल को भारत का प्रधानमंत्री तमिलनाडु या पश्चिम बंगाल से आता है तो क्या उन्हें UN में मजबूरी में खड़े होकर हिंदी में ही बात करनी होगी तो क्या यह सही होगा यह उनके ऊपर एक प्रकार से थोपना हुआ क्योंकि भारत में इतनी सारी विविधता है यहाँ इतनी सारी अधिकारिक भाषाये (OFFICIAL LANGUAGE) है।”
    उन्होंने यह भी कहा की भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ हिंदी को अधिकारिक भाषा माना जाता है भारत की कोई राष्ट भाषा भी नही है।

    वैसे अगर देखा जाया तो अराबिक भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अधिकारिक भाषा का दर्जा दिया है जो 22 देशों में लगभग बोली जाती है अगर जनसँख्या के हिसाब से बोली जाने वाली भाषा देखी जाय तो हिंदी अराबिक से भी ज्यादा लोग बोलते है। हिंदी विश्व कि तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है।

    अगर भारत की नम्र शक्ति (SOFT POWER) की बात की जाय तो बहुत अच्छी है। भारत (NDA GOVERNMENT ) ने अपनी नम्र शक्ति का करिश्मा दिखा चुका है 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित करके जिसमे 177 देशों का समर्थन मिला था और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (INTERNATIONAL COURT OF JUSTICE ) में न्यायाधीश दलवीर भंडारी को  भारतीय सदस्य बनाने में भी, जिसमे 183 देशों का समर्थन मिला था।

    किसी भी देश की नम्र शक्ति (SOFT POWER) तीन चीजों से आंकी जा सकती है जिसमे शामिल है उसकी संस्कृति जो और देशों को अपनी ओर आकर्षित करती है और फिर है उसकी राजनीतिक मूल्य और उसकी विदेश नीति कितनी मजबूत है।


    दक्षिण भारत के नेताओं ने कहा: मुझे अंग्रेजी भाषा चाहिए ही चाहिए?

    भारत के संविधान के हिसाब से देखा जाय तो हिंदी और अंग्रेजी दोनों को अधिकारिक भाषा माना गया है, पर अंग्रेजी को सिर्फ 15 साल के लिए ही अधिकारिक भाषा माना जाना था जिसे 1963 में ही खत्म कर देना चाहिए था पर दक्षिण भारत के नेताओं ने इसका विरोध किया और कहा मुझे अंग्रेजी भाषा चाहिए ही चाहिए। भारत में एंटी हिंदी आन्दोलन तमिलनाडु और केरल जैसे प्रदेशों में बहुत हो चुके है।

     

    1937 में अंग्रेज़ी हुकूमत के समय ही मद्रास प्रेसीडेंसी में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कहने पर स्कूलों में हिंदी अनिवार्य विषय बनाने का फैसला लिया गया। तीन साल तक मद्रास प्रेसीडेंसी के लोगों ने इसका पुरजोर विरोध किया लोग सड़कों पर उतर आये, जन आन्दोलन किये, धरने किये, अनशन किये। अंत में 1940 में मद्रास प्रेसीडेंसी के गवर्नर लार्ड इर्सकिन (LORD ERSKINE) ने इस फैसले को वापस ले लिया।

    आजादी के बाद भी भारत सरकार ने काफी मसक्कत की हिंदी को भारत की अधिकारिक भाषा बनाने की जिसका गैर हिंदी भाषी प्रदेशों ने जमकर विरोध किये। इन्ही सब डर कि वजह से पं. जवाहरलाल नेहरु ने अधिकारिक भाषा अधिनियम 1963 (OFFICIAL LANGUAGE ACT 1963 ) बनाया जिसमे कहा गया की अंग्रेजी को भारत की अधिकारिक भाषा 1965 के बाद भी बनाये रखा जायेगा, फिर भी गैर हिंदी भाषी प्रदेशों ने विरोध जारी रखा उनको डर था कहीं अंग्रेजी को हटाने कि साजिश तो नही चल रही है।

    1967 में जब इंदिरा गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने अधिकारिक भाषा अधिनियम 1963 में संसोधन करके हिंदी और अंग्रेजी दोनों को अधिकारिक भाषा का पुर्ण रूप से दर्जा दे दिया जो आज तक जारी है।

    अगर हिंदी भारत में एक यूनिफार्म भाषा बन जाती है तो निसंदेह उसका पूरे भारत को फायदा मिलेगा जिससे देश में एकता काफी हद तक बढ़ेगी।

    जैसा की हम लोग जानते है की 14 सितम्बर को हिंदी गौरव दिवस मनाया जाता हैं | 1949 में संविधान सभा में हिंदी देवनागरी लिपि को अधिकारिक भाषा बनाई गयी थी। भारत के संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343  से 351 तक अधिकारिक भाषा के बारे में बताया गया है।

    अनुच्छेद 343(1) में भारत संघ की अधिकारिक भाषा हिंदी देवनागरी लिपि होगी बताया गया गया है।

    अनुच्छेद 343(2) में बताया गया है अंग्रेजी भारत की अधिकारिक भाषा सिर्फ 15 साल के लिए ही होगी।

    बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है की भारत की कोई राष्ट्रीय भाषा नही है जिसके वजह से आज यह सब यातनाये विश्व स्तर पर भी झेलनी पड़ रही है।

    अगर संविधान के प्रावधानों को नजर में रख कर देखें तो कहीं ना कहीं यह बात निकल कर सामने आती है की हिंदी ही भारत की राष्ट्रीय भाषा है चूँकि हम लोग अंग्रेजी हुकूमत के दयारा 200 साल तक राज किये हुए थे  जिससे सभी लोगों व सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों को बदल पाना आसान नही था जिसके लिए भारत के संविधान में रियायत 15 साल के लिए दिया गया था।

    अगर पं जवाहरलाल नेहरु और इंदिरा गाँधी अपनी राजनीतिक कूटनीति का कुछ करिश्मा दिखा पाते तो आज भारत संघ की हिंदी राज भाषा होती।

    संविधान निर्माताओं ने भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए भारतीय संसद व राज्य परिषद् (COUNCIL OF STATES ) के लिए भारतीय संविधान में अनुच्छेद 120(1) में जो सदस्य (MP/MLA/MLC) हिंदी व अंग्रेजी में अपनी बात नही रख सकते वे सभापति से अनुमति लेकर अपनी मातृभाषा में अपनी बात रख सकते हैं।

    अगर हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में सातवीं अधिकारिक भाषा का दर्जा मिलता है तो विश्व स्तर पर भारत के लिए यह गौरव की बात होगी। हिंदी से भारतीयों के लिए देश विदेश में रोजगार के नए अवसर सृजन होंगे। लोग भारत की ओर रुख करेंगे जिससे भारत एक आकर्षण का केंद्र बनेगा और हमारे पास विश्व को दिखाने के लिए क्या नही है। जिससे भारत की आय में वृद्धि होगी और भारत को दुनिया अलग नजर से देखेगी।

    हमें लगता है वक्त आ गया है अपनी अंदरूनी कलह को भुला कर, राजनीतिक रोटियां सेंकने के बजाय एक अच्छी पहल का समर्थन करें और भारत के राष्ट्र निर्माताओं के मन में बची हुई टीस को एकजुटता से खत्म करें।

    (लेखक डा राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, लखनऊ के छात्र हैं)

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    3 Comments

    1. nitish on January 26, 2018 6:06 pm

      Nice initiative…

      Reply
    2. Anurag on January 26, 2018 11:21 pm

      Thank you

      Reply
    3. Neha mishra on January 27, 2018 12:44 pm

      Nice information.

      Reply
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