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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    ज्यादा बारिश डराती है कहीं फिर न हो धराली जैसी त्रासदी!

    ShagunBy ShagunAugust 25, 2025 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    वायरल वीडियो में कैद हुयी भारी तबाही
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    Post Views: 287

    सुशील कुमार

    उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में धराली गांव के बहने की घटना ने एक बार फिर प्रकृति के साथ खिलवाड़ के गंभीर परिणामों को उजागर किया है। खीरगंगा नदी में बादल फटने या हैंगिंग ग्लेशियर के टूटने से आई अचानक बाढ़ ने पूरा कस्बा तबाह कर दिया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसे देखकर लोग चिंतित हैं और जलवायु परिवर्तन व पर्यावरणीय क्षति पर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, यह प्रतिक्रिया तात्कालिक लगती है, क्योंकि 2013 के केदारनाथ हादसे जैसी भयावह त्रासदी के बाद भी कोई ठोस सबक नहीं लिया गया। उस हादसे में आधिकारिक तौर पर 6,000 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और लगभग 4,000 लोग लापता हो गए थे, फिर भी पहाड़ों में पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ जारी रही।

    पारिस्थितिकी पर मंडराता खतरा

    धराली की घटना ने एक बार फिर सवाल खड़े किए हैं कि क्या अब प्रकृति के साथ खिलवाड़ रुकेगा? उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे हिमालयी क्षेत्रों में अनियंत्रित मानवीय गतिविधियां, जैसे पनबिजली परियोजनाएं, नदियों का रास्ता मोड़ना, बड़े बांधों का निर्माण, पर्यटन के नाम पर रिसॉर्ट्स और होटलों का विकास, अंधाधुंध खनन और पेड़ों की कटाई, पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़ रही हैं।

    वायरल वीडियो में कैद हुयी भारी तबाही

    विशेषज्ञों का मानना है कि टिहरी बांध जैसे बड़े ढांचों ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित किया है, जिससे बादल फटने की घटनाएं बढ़ी हैं। टिहरी बांध का जलग्रहण क्षेत्र 50 वर्ग किलोमीटर से अधिक हो गया है, जो बादल बनने की प्रक्रिया को तेज करता है। साथ ही, मैदानी इलाकों में जंगलों की कमी के कारण मानसून के बादल पहाड़ों पर ज्यादा बरसते या फटते हैं, जिससे अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएं बढ़ रही हैं।

    जलवायु परिवर्तन भी इस संकट को गहरा रहा है। पहले चार महीने का मानसून अब दो महीने में सिमट गया है, जिससे बारिश की तीव्रता बढ़ी है। वैज्ञानिक चेतावनियां बताती हैं कि औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी का तापमान 2.5% बढ़ चुका है और अगले 25 वर्षों में यह 2% और बढ़ सकता है। यह धरती के लिए बढ़ता हुआ “बुखार” है, जो पर्यावरणीय संतुलन को और बिगाड़ेगा।

    मानवीय लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना निर्माण

    धराली जैसे हादसों के पीछे मानवीय लापरवाही भी कम जिम्मेदार नहीं है। नदियों के किनारे और इको-सेंसिटिव जोन में नियमों को ताक पर रखकर निर्माण हो रहा है। धराली में बाढ़ से बहने वाले होटल और होमस्टे ऐसे ही क्षेत्रों में बने थे, जहां निर्माण प्रतिबंधित है। पहले पहाड़ी गांव नदियों से दूर बनाए जाते थे, लेकिन पर्यटन के बढ़ते दबाव में नदियों के किनारे होटल और रिसॉर्ट्स बन रहे हैं। यह न केवल जोखिम भरा है, बल्कि पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन भी है।

    विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की जरूरत

    हालांकि, इस समस्या को केवल एक पक्ष से देखना उचित नहीं है। पहाड़ी क्षेत्रों में विकास की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। स्थानीय लोगों के लिए रोजगार, बुनियादी सुविधाएं और आर्थिक विकास जरूरी हैं। पनबिजली परियोजनाएं बिजली उत्पादन और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। पर्यटन भी स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। लेकिन यह विकास पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर होना चाहिए। सुझाव और समाधान:इको-सेंसिटिव जोन में सख्ती: निर्माण पर प्रतिबंध को कड़ाई से लागू किया जाए। धराली जैसे क्षेत्रों में अवैध निर्माण की जांच हो और जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो।

    वनीकरण और संरक्षण: मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और जंगल संरक्षण की योजनाएं लागू की जाएं।
    सतत विकास मॉडल: पनबिजली परियोजनाओं और पर्यटन विकास को पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों के साथ लागू किया जाए। छोटी और मध्यम आकार की परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाए।
    जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई: मानसून के बदलते पैटर्न और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए दीर्घकालिक नीतियां बनें।
    स्थानीय भागीदारी: स्थानीय समुदायों को पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन में शामिल किया जाए। उनकी पारंपरिक जानकारी का उपयोग टिकाऊ विकास में किया जा सकता है।
    जागरूकता और शिक्षा: नागरिकों और नीति-निर्माताओं को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जाएं।

    वास्तव में धराली की त्रासदी प्रकृति का चेतावनी संदेश है। यह न तो पहली ऐसी घटना है और न ही आखिरी होगी, अगर हम अभी नहीं चेते। सरकार, नागरिक समाज और स्थानीय समुदायों को मिलकर पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। अंधाधुंध निर्माण, जंगलों की कटाई और नियमों के उल्लंघन को रोकना समय की मांग है। साथ ही, विकास की योजनाओं को पर्यावरण-अनुकूल बनाकर पहाड़ों की नाजुक पारिस्थितिकी को बचाया जा सकता है। यदि अब भी सबक नहीं लिया गया, तो भविष्य में ऐसी त्रासदियां और भयावह रूप ले सकती हैं।

    Shagun

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