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    Home»धर्म»Spirituality»Short Inspirational

    धर्म और अधर्म दोनों साथ चलते हैं

    Saurabh ShrivastavaBy Saurabh ShrivastavaMarch 30, 2025 Short Inspirational No Comments3 Mins Read
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    ज्ञान की गंगा :अजीत कुमार सिंह

    माता गौरी ने कहा, प्रभु भगवान श्रीराम के अवतार का मूल कारण क्या है वे किस उद्देश्य के लिए धरा धाम पर अवतरित हो रहे हैं क्या अत्याचारी रावण का वध करना ही मूल उद्देश्य है प्रभु? भगवान भोलेनाथ बोले ईश्वर लोक में देवत्व की स्थापना के लिए आते हैं देवी असुरत्व का विनाश तो यूँ ही हो जाता है रावण का अंत करना उनके अवतार का हेतु नहीं है ईश्वर इतने छोटे काज के लिए अवतार नहीं लेते राम का आना यूँ ही रावण के अंत का सूचक है राम धर्म की स्थापना के लिए लोक में भ्रमण करेंगे और इसी बीच कभी रावण का अंत भी कर देंगे

    माता ने कहा,तो महादेव तब इस महान अवतार का क्या कारण है भोलेनाथ मुस्कुराए कहा कोई भी युग हो, धर्म और अधर्म दोनों साथ चलते हैं कभी धर्म प्रभावी होता है तो कभी अधर्म जब अधर्म प्रभावी होता है तो साधारण मनुष्य का देव और देवत्व से विश्वास टूटने लगता है उनके मन में यह प्रश्न स्थान बना लेता है कि यदि ईश्वर हैं तो हमारी रक्षा क्यों नहीं कर रहे? अत्याचारियों का प्रभाव इतना बढ़ता क्यों जा रहा है? साधारण मनुष्य के मन में ऐसे प्रश्न उठना सहज ही है तब हम त्रिदेवों का कर्तव्य हो जाता है कि मानवता के कल्याण के लिए अंशावतार या पूर्णावतार ले कर धरा धाम पर आएं और देवत्व की स्थापना करें प्रभु का लक्ष्य बस यही तो है….

    प्रभु यदि देवत्व की स्थापना आप सब का कर्तव्य है तो फिर आप अधर्म को प्रभावी होने ही क्यों देते हैं? धार्मिक मनुष्य के जीवन में पीड़ा आने ही क्यों देते हैं? संसार कितना सुंदर हो जाता यदि किसी के जीवन में दुख आता ही नहीं यह उचित नहीं होगा देवी मैंने कहा न कि धर्म और अधर्म सदैव बने रहेंगे यदि जीवन में केवल सुख ही रहे तो मनुष्य के पुरुषार्थ की क्याआवश्यकता रह जायेगी? क्या वह अकर्मण्य नहीं हो जाएगा?

    मनुष्य को अपने जीवन के संघर्षों से अपने पुरुषार्थ के बल पर ही पार पाना होता है, और अंततः वह पार पा ही लेता है यदि स्थितियां बिल्कुल ही विपरीत हो जाँय, धर्म बिल्कुल ही समाप्त होता दिखने लगे, जब संकट व्यक्ति पर नहीं पूरी सभ्यता पर आये, तब ही ईश्वर को अवतार लेना होता है पर मनुष्य के जीवन मे सदैव सुख ही रहता तो कितना सुन्दर होता न? ऐसा नहीं हो सकता क्या?

    सुख जीवन का सौभाग्य है, पर जीवन सदैव सुखमय ही तो नहीं हो सकता न? सुख और शान्ति यदि विद्वतजन के जीवन में रहे तो वे जगत कल्याण की सोचते हैं पर सामान्य मनुष्य अहंकार के वशीभूत हो कर दूसरों को पीड़ा देने लगता है इसी लिए सभ्यता का संतुलन दुख और सुख दोनों के बने रहने में है..

    वाह! उत्तम प्रभु! तो प्रभु के अवतरित होने में कितना समय शेष है?अधिक नहीं देवी देखिये अयोध्या की ओर, प्रकृति की समस्त शोभा उस दिव्य नगरी में उतर कर जैसे कह रही हो, विप्र धेनु सुर और संतों के हित के लिए प्रभु आने ही वाले हैं.

    Saurabh Shrivastava
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