होइहे वही जो राम रची रखा!

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हमारे देश की बहुदलीय लोकतंत्र की राजनीतिक विचारधारा में विकल्प एक प्रमुख धुरी है। देश की बहु सांस्कृतिक एवं भौगोलिक विविधता वाले रानीतिक एवं सामाजिक परिवेश में विकल्प हीनता की कल्पना मात्र से सिहरन पैदा होना स्वाभाविक सी बात है। हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के ढांचे में एक मजबूत सरकार होने के साथ ही एक मजबूत विपक्ष का होना भी नितान्त आवश्यक है। इसी विचार धारा के अनुसार यदि हम बात करें तो बीते कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति के मैदान में एक धारदार विपक्ष के नहीं होने से कई बार सत्तासीन सरकार अपने मुताविक कार्यों को अंजाम देने लगती है ऐसे समय उसको न तो कोई रोकने टोकने या विरोध न करने वाला होने से उसके स्वछंद होने जैसा खतरा मौजूद होता है

आज एक मजबूत विपक्ष के न होने या उसके सिकुड़ते दायरे की वजह से वर्त्तमान समय के भारतीय राजनीति के धरातल पर शून्यता के जन्म होने से सन्नाटे की स्थिति पैदा हो गई है। नव वर्ष में विपक्षी पार्टियों एवं सियासत में मुख्यतः कांग्रेस को न केवल इस् शून्यता की भरपाई की दिशा में जोरदार प्रयास करना तो होगा ही साथ ही साथ इसका समाधान भी उसे ही निकालना पड़ेगा। इसका समाधान भी तभी निकल पायेगा जब कांग्रेस नकारारात्मकता को छोड़कर सकारात्मक राजनीति की दिशा की ओर अपनी कदम आगे बढ़ाएगी। वही पर विपक्षियों की बात करें तो विपक्ष के उन राजनितिक लोगों की विगत वर्षों के क्रियाकलापों से यह तस्वीर उभर कर सामने आई है कि कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी के स्वमं पार्टी अध्यक्ष की कमान संभालने  के बाद उनके पार्टी के अंदर लोगों के मन में एक लंबे समय से चली आ रही दुविधा का अंत अवश्य हुआ है लेकिन पार्टी में नेतृत्व का चेहरा परिवर्तन मात्र से ही कांग्रेस पार्टी के राजनितिक सियासत की दशा दिशा का कायाकल्प हो जाएगा ऐसी कोई बात फिलहाल अभी दिखाई नहीं दे रही है।

उत्तर प्रदेश में सपा एवं बसपा जैसी पार्टियों की आपसी लड़ाई का इतिहास हम सभी लोगों के सामने है। एसे अंतर्विरोधों के बीच राहुल गांधी के लिए शरद पवार, ममता बनर्जी और मायावती जैसी धुरंधर नेता को साधे रखना कितना आसान होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है। यह तो निश्चित है कि पार्टी की नीति एवं रीती के अनुसार सोनिया गांधी के पश्चात राहुल गांधी ही कांग्रेस के प्रमुख होंगे, इस बात पर शायद ही किसी को कोई संदेह रहा हो। यह वास्तविक है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से पार्टी की राजनीतिक सियासत की संचालन स्वमं राहुल गांधी ही कर रहे हैं।

देश के शासन सत्ता की बागडोर एक लंबे समय तक सँभालने वाली पार्टी के इस हालत में पहुंच जाने के बाद अभी वर्त्तमान समय तक पार्टी में किसी भी प्रकार की कोई ऐसा बुनियादी बदलाव न हुआ या होता नजर नहीं आया है कि जिससे आने वाले भविष्य में परिवर्तन या आशा की किरण ही दिखाई दे।

हम इस बात से कतई इंकार नहीं कर स्कतें है कि देश में भाजपा के बाद केवल कांग्रेस ही सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है, लेकिन जहाँ तक उत्तर प्रदेश की बात करे तो अभी हाल ही में हुए चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने या बिहार में हुए भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार जैसे गंभीर आरोपों से घिरे लालू प्रसाद यादव के परिवार के साथ खड़े होने जैसी निर्णय लिए जाने की मजबूरियों की वजह से यह बात जग जाहिर हो चूका है कि कांग्रेस को स्वमं के राजनीतिक पकड़ या वहां के पार्टी कार्यकर्ताओं पर विश्वास न होने के कारण उन्हें गठबंधन जैसी बैशाखी के सहारे की आवश्यकता भाजपा के प्रभुत्व को चुनौती देने जैसी राजनीति के लिए पड़ी। मौजुदा समय में देश की एक प्रमुख विपक्षी दल के एक विकल्प के रूप में अपने आपको प्रस्तुत करने के लिहाज से देश में अब पुराने पड़ चुके नीतियों के वल पर सियासती विचारधारा के बदलते परिवेश में देश की आकांक्षाओं पर खरे उतरते हुए कांग्रेस दिखाई नहीं दे रही है।

शायद इन्ही कारणों के चलते बिहार के नीतीश कुमार जैसे एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ व्यतित्व ने कांग्रेस के साथ जाने की वजाय पुनः एनडीए-भाजपा के साथ ही जाना ही बेहतर समझा। इस बात में कोई संदेह् नहीं है कि देश को एक मजबूत विपक्ष देने जैसी बात पर अपनी संपूर्ण ऊर्जा को व्यय करने जैसी  राजनीति करना केवल प्रतिक्रिया मात्र या खबरों तक ही सीमित हो जाने जैसी राजनीति करना जनता अवश्य पसंद नहीं करेगी। इसे हम हल ही के गुजरात लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत केवल 44 की संख्या तक सिमट कर रह जाने जैसी कमजोरी के कारण या फिर उसके सहयोगी क्षेत्रीय दलों के दबाव में वह वैकल्पिक राजनीतिक जैसे मुद्दे को भूल चुकी है। वहीं बिहार में नीतीश कुमार के एनडीए के साथ जाने से पहले कई बार खुले रूप से कांग्रेस को अपने वैकल्पिक सकारात्मक एजेंडे जैसे मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाने की सलाह दे चुकी है। लेकिन शायद कांग्रेस इसे बहुत हलके में लेते हुए इस बात की अनदेखी ही किया है, जिसके फलस्वरूप सियासी राजनीतिक  विपक्षीयों का एकजुट होने जैसा अभियान नीतीश कुमार के एनडीए के चले जाते ही धूमिल पड़ जाने से देश को एक मजबूत विपक्ष देने जैसी उसकी राजनीति मुद्दे की नींव वर्त्तमान समय में पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई।

यहाँ यह बात जरूर है कि नीतीश कुमार के इन कोशिशों से एक बार ऐसा लगने लगा था कि नितीश कुमार विपक्षी पार्टियों को एकजुट कराने में कामयाब हो जायेंगे लेकिन वर्त्तमान परिस्थियों में यदि इसे जमीनी हकीकत को देखा जाए तो यही कहना पड़ता है कि विपक्षीयों का यह गोलबंदी का मंच पूर्ण रूप से अंतर्विरोधों जैसे लोगों का अखाड़ा मात्र है। इसीलिए यदि चंद मौकों को छोड़ दिया जाये तो विपक्षीयों का यह गोलबंदी का गुट मौजूदा समय में किसी प्रभावी भूमिका में नजर नहीं आ रहा है और फिलहाल निकट भविष्य में भी होता नजर नहीं आ रहा है।
जी के चक्रवर्ती

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