पर्यावरण और जलवायु किसी भी देश की आत्मा होती है। पर्यावरण बेहतरीन होगा तो बाशिंदों के स्वास्य से लेकर तरक्की के सभी साधन विकसित होंगे तो प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता में तेजी से सुधार होगा। हालांकि ऐसा नहीं कि अभी तक पर्यावरण संवर्धन की दिशा में कुछ नहीं हुआ। लेकिन उन कामों के सार्थक परिणाम नहीं दिखे। लोक सभा चुनाव में कांग्रेस ने पर्यावरण संवर्धन से रोजगार देने की दिशा में सार्थक कदम उठाने की घोषणा की है। शायद यह एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश है।
निश्चित रूप से कांग्रेस का ताजा मकसद चुनावी लाभ लेना है पर अगर कांग्रेस सत्ता में आने पर इसे मनरेगा की भांति पूरी ईमानदारी से क्रियान्वित करने का माद्दा रखती है इससे निश्चय ही देश की तस्वीर में बदलाव दिखेगा। खास तौर से इससे ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदलेगी। यह पर्यावरण संवर्धन अर्थात पौधरोपण की दिशा में पहल होगी। इससे बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिलेगा, बंजर भूमि उपजाऊ होगी, भू-गर्भ जल का स्तर बढ़ेगा और सबसे बढ़कर पर्यावरण बेहतरीन होगा। इस बदलाव से खेत-खलिहानों की दशा एवं दिशा भी बदलेगी।

मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों को रोजगार दिये वहीं तालाबों से लेकर अन्य ग्रामीण विकास कार्य भी दिये, जिसका सीधा लाभ ग्रामीण बाशिंदों को मिला है। इन सबके बीच अहम सवाल यह कि पर्यावरण संवर्धन को शहरी अर्थात मेगा सिटी में कैसे लायेंगे! इसकी सबसे अधिक आवश्यकता शहरों को है। मेगाटाउंस में सांस लेना दूभर हो रहा है। गांव-गिरांव में पर्यावरण की दशा एवं दिशा अभी उतनी गंभीर नहीं है। कांग्रेस की यह पर्यावरण रीति-नीति शहरी पर्यावरण के विकास को लेकर होती तो शायद बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर होते तो वहीं प्रदूषण से भी कुछ राहत मिलती।
लोग स्वच्छ हवा में सांस ले पाते। ऐसा नहीं कि कांग्रेस ने सामाजिक बदलाव की दिशा में कोई विशेष योजना पेश की है। इसके पहले केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने गंगा ग्राम स्वच्छता योजना लाई थी। इसके तहत गंगा के किनारे बसे गांवों का विकास शामिल किया गया था। इस योजना में कचरा प्रबंधन, तालाबों-जलाशयों का संवर्धन, जल संरक्षण परियोजना, जैविक खेती, बागवानी-खेती, औषधीय पौधों का संवर्धन शामिल है। लेकिन धरातल में पर कुछ नहीं दिखता। इसी तरह, समाजसेवी गोविन्दाचार्य ने जल, जंगल ओैर जमीन का अस्तित्व बचाने के लिए लोगों को अधिकार सम्पन्न बनाने की वकालत की थी, पर हुआ कुछ नहीं। ऐसे में घोषणाओं पर ईमानदारी से अमल करने की जरूरत बनी हुई है।
- रामेन्द्र सिंह चौहान







