अखबार अब महंगे हो चले हैं। चार से पांच रुपये तक कीमत हो गई है। कीमत बढ़ने के तमाम कारण हो सकते हैं, लेकिन क्या पाठक भी बढ़े हैं!
थोड़े-थोड़े दिनों में अखबार जो इतने या उतने लाख पाठक होने ‘दावा’ छापते हैं, यह कितना सही होता है और कितना फर्जी; यह तो वही बता सकते हैं। पर मुझे हमेशा से ही पाठकों की संख्या पर ‘शक’ रहा है।
अगर इतने लाख पाठक हैं भी तो वे अखबारों में पढ़ते क्या होंगे! विज्ञापन? लूट, चोरी, हत्या, बलात्कार, प्रेम-संबंध? देखा जाए तो अखबारों में अब यही सब बचा है। या फिर बचा है, सरकारों और फलां मंत्री की तारीफें।
अखबार अब सरकार और प्रशासन की बखिया भी काफी देखभाल कर उधेड़ते हैं।
संपादकीय पृष्ठ का जहां तक सवाल है, कुछ अखबारों ने ‘बहसतलब’ लेख ही छापने अब बंद कर दिए हैं। एक दौर था, जब संपादकीय पृष्ठ पर छपने वाले लेखों पर ‘पत्र-स्तम्भ’ में लंबी-लंबी बहसें चला करती थीं। ‘काउंटर-लेख’ भी छपते थे। अब सब सरकार भरोसे है!
बाजार और अतिरिक्त जोखिम न लेने की प्रवृत्ति ने अखबारों का बड़ा नुकसान किया है।
– अंशुमाली रस्तोगी की वॉल से







