चेन्नई की कालेज छात्राओं के साथ संवाद करते हुए राहुल गांधी का आत्मविश्वास, खुलापन, उनकी विनम्रता, शालीनता, आत्मीय और अनौपचारिक अंदाज़ अच्छा लगा। राहुल गांधी ने कालेज की लड़कियों से बेतकल्लुफ़ी से कहा कि उन्हें सर न कहें, राहुल कहें। गंभीर मसलों पर राय रखने के साथ साथ हल्के फुल्के लहजे में यह भी कहा कि मैं युवा हूँ और यह भी कहा कि कृपया मुझे गाना गाने के लिए न कहें। उन्होंने हर सवाल का सहजता से जवाब दिया चाहे वह रोज़गार के बारे में हो, शिक्षा नीति के बारे में , राबर्ट वाड्रा के बारे में या प्रधानमंत्री को लोकसभा में गले लगाने के बारे में। एक बार फिर उन्होंने घृणा और विद्वेष की राजनीति के जवाब में प्रेम की नीति अपनाने की बात कही।
पिछले पाँच साल में नरेंद्र मोदी की भाषण कला का बड़ा डंका पीटा गया है और राहुल को उनके मुक़ाबले बोलने के मामले में पप्पू साबित करते हुए मोदी जी की अपराजेयता का हौआ सा खड़ा कर दिया गया है। राहुल गांधी ने धीरे-धीरे लगातार इस मामले में अपनी छवि में सुधार किया है और अब कई बार वह सार्वजनिक संवाद के मोर्चे पर नरेंद्र मोदी से बेहतर साबित हो रहे हैं। मोदी जी के सार्वजनिक संबोधनों में एक अकड़ होती है। 56 इंच की छाती की गर्वोक्तियों की झलक। अपने ज्ञान, जानकारी, हाज़िर जवाबी का रोब जमाते हुए सामने वाले को चौंका कर, सहमा कर चुप करा देने की ठसक और तालियों की गड़गड़ाहट सुनने की लपलपाती हुई इच्छा उनके दर्प भरे चेहरे पर सामान्यत: दिख ही जाती है।

याद कीजिए बच्चों से संवाद के दौरान एक माँ के सवाल के जवाब में वह पब जी वाला कमेंट और उसके बाद की विजयी मुस्कुराहट। और हाल में विंग कमांडर अभिनंदन की रिहाई के ऐलान पर ‘पायलट प्राॅजेक्ट’ वाली स्तब्धकारी टिप्पणी। कभी-कभी यह ख़याल आता है कि अगर राहुल गांधी की जगह नरेंद्र मोदी ने अपने परिवार के लोगों, निकटतम संबंधियों को आतंकवाद का निशाना बनते देखा होता, उस त्रासदी से, पीड़ा से गुज़रना पड़ा होता तो अपने वर्तमान स्वभाव के अनुरूप वह सार्वजनिक सभाओं में इस बारे में किस अंदाज़ में चर्चा करते या किस तरह की भावुक प्रस्तुतियाँ करते? शायद ही कोई भूला हो उन्होंने जिस तरह अपनी मां के बर्तन माँजने की कहानी विदेश तक में सुनाई थी।
राहुल गांधी इसके उलट एक सभ्य, सौम्य अनौपचारिक छवि निर्माण का प्रयास कर रहे हैं। उनके डीएनए को लेकर अनंत हेगड़े की निहायत आपत्तिजनक टिप्पणी पर बीजेपी के किसी वरिष्ठ-कनिष्ठ नेता ने खेद जैसा कुछ कहा हो, अब तक तो सामने नहीं आया। भय और भक्ति के चलते सरकार के चरणों में पड़े इलेक्ट्रानिक मीडिया से यह उम्मीद ही करना बेकार है कि वह बीजेपी और सरकार की कोई लानत-मलानत करेगा इस तरह की टिप्पणियों पर।
बहरहाल ऐसे मामलों में कोई भी प्रतिक्रिया न देना उनकी शालीन पारिवारिक पृष्ठभूमि से मेल भी खाता है और उनके आलोचक और प्रशंसक दोनों ही उनसे मौजूदा कटुतापूर्ण और प्रतिशोधात्मक राजनीतिक विमर्श के बीच भी शालीन बने रहने की अपेक्षा करते हैं। अच्छा ही हुआ कि कल गुजरात में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के भाषणों में इस तरह की गर्वोक्ति नहीं दिखी कि मोदी जी हम गुजरात से अपना अभियान शुरू कर रहे हैं और आपके घर में घुस कर आपको मारेंगे।
चुनाव जीतना ज़रूरी है लेकिन एक शालीन सभ्य राजनीतिक संस्कृति और वातावरण का निर्माण भी उतना ही ज़रूरी है।
– अमिताभ श्रीवास्तव की वॉल से







