हर घर दो सकोरेः परम्परा का आधुनिक निर्वाह

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हर घर दो सकोरेः परम्परा का आधुनिक निर्वाह, प्रक्रिया व लाभ सनातन भारतीय संस्कृति में पंचमहायज्ञ प्रत्येक व्यक्ति को करने के लिये कहा गया है, इसमें पाँचवें यज्ञ को भूतयज्ञ अर्थात पंचबलिकर्म कहते हैं, अर्थात इसमें भोज न के समय आसपास के विभिन्न जीवों के लिये अन्न अलग रख दिया जाता है, जैसे कि गाय के लिये एक रोटी के रूप में गौग्रास एवं काकबलि अर्थात कौवे के लिये एक रोटी इत्यादि।

हर मौसम में पशु-पक्षियों व कीटादि के लिये खाद्य व पेय भोजन-जल का प्रबन्ध करना हर मानव का उत्तरदायित्व है। पंचसूना-दोष का प्रायष्चित्त प्रतिदिन होता रहे इसके लिये पंचमहायज्ञ किये जाने की व्यवस्था है, दिनचर्या में पाँच क्रियाओं से मनुष्यों द्वारा जीव हिंसाएँ अनजाने में होने की आषंका लगी रहती हैः

भोजन की तैयारी:

1⁄4चूल्हा, स्टोव1⁄2, आटा पीसना, झाड़ू बुहाराना, मसाले कूटना एवं जलव्यवस्था; इन पाँचों दोषों को पंचसूना-दोष कहते हैं।

आधुनिक कलेवर में भूतयज्ञ कैसे करें?

मिटटी के दो सकोरे घर ले आयेंः- 1⁄2 एक सकोरे में गिलहरियों व पक्षियों के लिये पेयजल प्रतिदिन रखें। दोनों सकोरों को नियमित रूप से साफ़ करते रहें।

1⁄2 दूसरे सकोरे के लिये स्थानीय हाट-बाज़ार अथवा किराने की दुकान में जाकर व्यापारी से बोलेंः ”सभी साबुत देसी अनाज मिलाकर एक मिश्रण तैयार करके दें“; इस मिश्रण को प्रतिदिन इस सकोरे में रखें।

सप्तधान्य 1⁄4 जौ, तिल, धान, मूँग, कंगनी, चना, गेहूँ1⁄2 अथवा इससे भी अधिक विविधता लायी जा सकती है, जैसे कोदो, कुटकी, मसूर, बटरा/सूखी मटर इत्यादि। इन सकोरों को सुरक्षित व स्वच्छ स्थान पर रखें अथवा सुरक्षित रूप से लटकायें। प्लास्टिक व धातुओं के स्थान पर मिटटी के सकोरे प्राकृतिक व हानिरहित होते हैं तथा धोने में भी सुविधापूर्ण। इनमें रखा खाद्य व पेय दूषित नहीं होता अपितु अधिक समय तक उपयोगी बना रहता है।

ऊँ लाभः-

क 1⁄2 जैव-विविधता के संरक्षण की ओर घर-बैठे आपका एक महत्त्वपूर्ण योगदान हो जायेगा;

ख 1⁄2 पंचसूना-दोष के निवारण का उपाय भी,

ग 1⁄2 आसपास जीवटता के संचार से आपको मानसिक सुख व आध्यात्मिक कल्याण होगा सो अलग।

  • लेखक: सुमित कुमार राय

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