ऑनलाइन गेमिंग की भेंट चढ़ता बच्चो का जीवन…! सॉरी पापा-मम्मी”… एक सुसाइड नोट ने पूरे देश को हिला दिया!
बृजेश सिंह तोमर, (लेखक वरिष्ठ पत्रकार,समाज चिंतक एवं अभिभाषक हैं)
4 फरवरी 2026 की सुबह गाजियाबाद के भारत सिटी सोसाइटी में तीन नाबालिग बहनें – 16 साल की विशिका, 14 साल की प्राची और 12 साल की पाकी – हाथ में हाथ डालकर नौवीं मंजिल की बालकनी से कूद गईं। तीनों की मौके पर ही मौत हो गई। एक छोटा-सा नोट मिला: “सॉरी मम्मी-पापा, हम गेम नहीं छोड़ पा रहे…” पुलिस जांच में सामने आया कि ये बहनें एक कोरियन टास्क-बेस्ड ऑनलाइन ‘लव गेम’ की गहरी लत में फंस चुकी थीं। कोविड के दौरान शुरू हुई ये आदत इतनी गहराई तक पहुंच गई कि माता-पिता ने फोन छीन लिया तो ये तीनों ने मौत को अपना ‘फाइनल टास्क’ मान लिया।
ये सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं – ये डिजिटल युग की सबसे खतरनाक सच्चाई है।
- बच्चे स्क्रीन में जीते हैं, लेकिन असल जिंदगी से कट जाते हैं।
- घर में सब साथ हैं, पर कोई बात नहीं करता।
- माता-पिता काम-धंधे में व्यस्त, बच्चे कोरियन कल्चर, K-पॉप और गेम्स में खोए हुए।
- डायरी में लिखा मिला: “कोरियन हमारी लाइफ है… हम सब कुछ साथ करते हैं।” लेकिन असल में वे अकेले थे – भावनात्मक रूप से पूरी तरह अकेले।

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बता दें कि ये पहली घटना नहीं। ब्लू व्हेल चैलेंज, PUBG, फ्री फायर, मोमो चैलेंज – हर साल दर्जनों बच्चे आभासी दुनिया की ‘हार’ या ‘टास्क’ को असल मौत में बदल देते हैं। इंदौर, हैदराबाद, मुंबई, दिल्ली – हर शहर में ऐसी खबरें आ रही हैं। WHO ने गेमिंग डिसऑर्डर को मानसिक बीमारी घोषित किया है, लेकिन हम अभी भी “बस एक गेम है” कहकर अनदेखा कर रहे हैं।
कानून है, लेकिन अमल कहां?
- IPC की धारा 305-306: आत्महत्या के लिए उकसाने वालों पर सख्त सजा।
- IT एक्ट की धारा 66E, 67, 67B: हानिकारक कंटेंट फैलाने वालों पर कार्रवाई।
- जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और POCSO: बच्चों की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी।
- साइबर सेल में तुरंत शिकायत दर्ज कराएं – लेकिन सबसे पहले घर में ‘स्क्रीन टाइम’ पर सख्ती लाएं।
अब सिर्फ अफसोस नहीं – एक्शन चाहिए!
माता-पिता: रोज कम से कम 30 मिनट बच्चे से बिना फोन के बात करें।
स्कूल: मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग अनिवार्य करें, खेल-कूद-कला को बढ़ावा दें।
सरकार: गेमिंग ऐप्स पर उम्र-आधारित सख्त फिल्टर और टास्क-बेस्ड गेम्स की निगरानी बढ़ाएं।
समाज: आत्महत्या की खबरों को सनसनी न बनाएं – जागरूकता फैलाएं, हेल्पलाइन (1098, 9152987821) का प्रचार करें।
बच्चों को सिखाएं: असफलता जिंदगी का हिस्सा है, गेम ओवर होने पर रीसेट बटन नहीं दबता।
तकनीक दोषी नहीं – हमारी लापरवाही दोषी है।
मोबाइल छीनने से समस्या खत्म नहीं होती, विश्वास और समय देकर ही बच्चे वापस लौटते हैं।
आज अगर हम नहीं जागे, तो कल की सुर्खी शायद हमारे घर से आएगी।
सवाल वही रहेगा: हमने बच्चों को सब कुछ दिया, बस अपना समय और दिल क्यों नहीं दिया?
जागें, बोलें, बचाएं – क्योंकि हर बच्चा सिर्फ एक गेम नहीं, बल्कि एक पूरी जिंदगी है।






