राजनीति, सिनेमा और विरोध के बहाने

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हेमंत पाल 
   फिल्मकारों को हमेशा नए कथानकों की खोज रहती है। इसी खोज में वे कभी हॉलीवुड की कहानियां चुराते हैं तो कभी रीजनल सिनेमा हिट कहानियों को बदलकर परोसते हैं। कई बार तो एक ही सफल कहानी को कलेवर बदलकर बार-बार फिल्माया जाता है! लेकिन, राजनीति ऐसा वर्जित विषय है जिसे फिल्मकार छूने से भी परहेज करते हैं। जबकि, राजनीति का परिदृश्य इतना परिमार्जित है, जिसमें किसी फार्मूला फिल्म के सारे मसाले मिलते हैं। इसके बाद भी फिल्मकार ऐसी कहानियों से बचते रहते हैं, जिनमें राजनीति का जरा भी तड़का लगा होता है। क्योंकि, जिसने भी इस काजल की कोठरी में घुसने की कोशिश की, वो साफ़ सुथरा बाहर नहीं निकल सका!    
  हिंदी फिल्मों के इतिहास के पन्ने पलटे जाएं, तो आजादी के बाद असल राजनीति पर गिनी-चुनी फ़िल्में ही बनी है। अमृतलाल नाहटा, गुलजार और प्रकाश झा जैसे कुछ निर्माताओं को छोड़ दिया जाए तो किसी ने भी राजनीति की जलती लकड़ी को पकड़ने की कोशिश नहीं की! किंतु, अब फिर कुछ फिल्मकारों ने सुलगते अंगारों को हाथ में उठा लिया! मधुर भंडारकर ने संजय गाँधी पर केंद्रित फिल्म ‘इंदू सरकार’ बना डाली और मिलन लूथरिया ने ‘बादशाहो।’ दोनों ही फिल्मों की कहानी 1975 के इमरजेन्सी के दौर को छूती है।
  ‘बादशाहो’ की कहानी पर तो अभी कोई उंगली नहीं उठी! पर ‘इंदू सरकार’ के बारे में कांग्रेस ने चेतावनी दे दी कि वह इस फिल्म का पूरे दम खम से विरोध करेगी! कांग्रेस का कहना है कि इस फिल्म में गाँधी परिवार को लेकर कई आपत्तिजनक टिप्पणी की गई है। फिल्म के ट्रेलर में ही गांधी परिवार पर निशाना साधा गया। कांग्रेस को आशंका है कि फिल्म में इंदिरा गांधी और संजय गांधी को इमरजेन्सी के बहाने गलत परिप्रेक्ष्य में दिखाया गया होगा! जबकि, मधुर भंडारकर का कहना है कि फिल्म को लेकर अभी कोई धारणा न बनाएं। पहले फिल्म देखें फिर विरोध की तलवार तेज करें!
 दरअसल, भारतीय राजनीति में इमरजेंसी ऐसा युग है, जिसके काले अध्याय पर कई कहानियां गढ़ी जा चुकी है। सबसे पहले अमृतलाल नाहटा ने ‘किस्सा कुर्सी का’ बनाई थी। उसके बाद सुधीर मिश्र ने ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ बनाकर चर्चा पाई! लेकिन, बांग्ला फिल्म ‘गणशत्रु’ और ‘कलकत्ता-71’ की तरह मौलिकता और गहरी राजनीति दिखाने का साहस कोई नहीं कर पाया। गोविंद निहलानी ने जरूर टेली फिल्म ‘तमस’ बनाकर दर्शकों को प्रभावित किया था। सिनेमा की दुनिया में राजनीति हमेशा ही सिमटा सा विषय ही रहा है। मणिरत्नम की ‘रोजा’, गोविंद निहलानी की ‘द्रोहकाल’ के बाद नई दिल्ली टाइम्स, बाम्बे, और ‘दिल से’ जैसी फिल्मों में जरूर राजनीति और अपराध के समीकरण दिखाई दिए।
  अपनी फिल्मों में राजनीति का तड़का मणिरत्नम, मृणाल सेन की तरह गुलजार ने भी लगाया और पारिवारिक रिश्तों में राजनीति को मिलाकर ‘आंधी’ का प्लाट रचा था। इस फिल्म का कथानक कहीं भी इंदिरा गाँधी जिंदगी से मेल नहीं खाता था, पर सुचित्रा सेन का मेकअप और ड्रेसअप जरूर इंदिरा गाँधी जैसा था। इसके बाद राजनीतिक साजिशों के कॉमिक हालातों पर ‘हु तू तू’ और आतंकवाद को पनपाती ‘माचिस’ भी गुलजार ने ही रची थी। लेकिन, आज का दर्शक प्रकाश झा की फिल्म ‘राजनीति’ के अलावा युवा, रंग दे बसंती, पार्टी या ‘ए वेडनेसडे’ और ‘ब्लैक फ्राई डे’ जैसी फ़िल्में पसंद करता है। राजनीतिक फिल्मों के बारे में एक सटीक टिप्पणी है ‘समस्या यह नहीं कि राजनीतिक फिल्में कैसे बनाई जाएं, बल्कि समस्या फिल्मों को राजनीतिक बनाने की है।’ बॉलीवुड यदि हॉलीवुड की तरह पहचान बनाना चाहता है तो उसे अमेरिकी फिल्मकारों की तरह दिमाग को खुला रखना होगा! साथ ही सेंसर कैंची की धार को भी भोथरा करना होगा, जिसने राजनीतिक कहानियों वाले सिनेमा को अछूत बना रखा है।