Home अध्यात्मिक मेरे पास जो वैभव है, मैं उसके मोह में बंधा नहीं हूं

मेरे पास जो वैभव है, मैं उसके मोह में बंधा नहीं हूं

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एक बार देवर्षि नारद एक सघन वृक्ष की छांव तले विश्राम करने बैठ गए। वह एक सेमल का वृक्ष था। नारद ने वृक्ष से कहा-तुम्हारी शाखाएं कितनी घनी हैं। तुम्हें इस वैभव को खोने का भय नहीं लगता? वृक्ष ने जवाब दिया – देवर्षि, मैं हरसंभव अपनी शरण में आए लोगों को छाया प्रदान करता हूं। मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं। फिर मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता है!

कुछ दिनों के बाद नारद जी सुरपुर पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने पवन देवता से कहा-मुझे वन में एक वृक्ष की बातों से ऐसा लगा कि उसे काफी दर्प है। उसे तो आपका भी भय नहीं। यह सुनकर पवन देव उसे सबक सिखाने के लिए चल पड़े। उधर ऋषि योनि का वह वृक्ष आने वाली आपदा को ताड़ गया। उसने अपने सारे पत्ते झड़ा दिए और खुद एक ठूठ के रूप में खड़ा हो गया। इस तरह तीव्र पवन से भी उस लूंठ का कुछ नहीं बिगड़ सका।

कुछ दिनों बाद संयोगवश नारद जी पुनः उस वन से गुजरे। उन्होंने देखा कि वह वृक्ष तो पूर्ण वैभव के साथ उसी तरह खड़ा है। यह देखकर नारद उससे बोले-तुम तो पहले की तरह ही खड़े हो। आखिर इसका रहस्य क्या है? वृक्ष ने कहा-मेरे पास जो वैभव है, मैं उसके मोह में बंधा नहीं हूं। वृक्ष की इस बात में यह संदेश निहित है कि हम न तो कभी अपने रूप-धनवैभव का अभिमान करें और न ही कभी संग्रह वृत्ति के फेर में पड़ें। – सुभाष बुड़ावनवाला

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