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    बेसहारों का सहारा बना ”बेसहारा”

    ShagunBy ShagunJune 5, 2020 Hot issue 1 Comment10 Mins Read
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    Post Views: 691

    कपिल यादव

    कहानी नही हकीकत कुछ ऐसी, जो आप को झकझोर कर रख देगी और अपने लक्ष्य के प्रति संघर्ष करने के लिए मजबूर कर दे। हम ऐसे व्यक्ति के जीवन संघर्ष की बात कर रहें है जिसका पूरा बचपन बेसहारा रहा हो, बचपन ईंट भट्ठों की मजदूरी, किशोरावस्था शहर के फुटपाथ और लेबर मंडी की मजदूरी से जीविका चलाई हो और आज वही बेसहारा मजदूर ऐसे ही सैकड़ों बेसहारों का सहारा बना हो। जिसे जन्म के कुछ समय बाद ही मां छोड़कर स्वर्ग लोक चली गयी हो। मिट्टी फूस से बनी झोपड़ी ही जिसका आशियाना हो। पिता दूसरों के खेत पर मजदूरी कर किसी तरह भोजन पानी का इंतजाम करते हो। जिसके भरण-पोषण का मात्र एक सहारा मजदूरी हो। उसी स्थिति में शिक्षा कैसी हो सकती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन शायद टूटी-फूटी शिक्षा ने आज उस शख्स को सम्मान दिलाया। यह सच है कि जिस स्थित में भोजन और दवा के लिए लाले हो उस स्थिति में कोई और क्या सोच सकता है। शायद कुछ और सोचना सिर्फ रात में आये सपने जैसा होगा जो आंखें खुलते ही सब कुछ स्थिर दिखता है। लेकिन यह भी सच है कि हौसला हिम्मत और लगन से कोई भी मंजिल हासिल की जा सकती है।

    मुश्किल नहीं है कुछ दुनिया में,
    तू जरा हिम्मत तो कर।
    ख्वाब बदलेंगे हकीकत में,
    तू ज़रा कोशिश तो कर।।
    आंधियां सदा चलती नहीं,
    मुश्किले सदा रहती नहीं।
    मिलेगी तुझे मंजिल तेरी,
    बस तू जरा कोशिश तो कर।।

    यह पंक्तियां उस शख्स पर सटीक बैठती है जो गरीबी और असहायो की स्थित में पला-बढ़ा। जिसे बचपन में मां का प्यार और अच्छे खिलौने तो नहीं मिले लेकिन वह आज बुजुर्गों और बच्चों को उनके अधिकार सम्मान दिलाने में मदद करता है। अनाथ और असहाय बच्चों के लिए फरिश्ता बनकर उसके सामने आ जाता है। जी हम बात कर रहे है समाजसेवी रत्नेश कुमार की। जिनका जन्म तहसील रामसनेहीघाट के बनीकोडर ब्लॉक के छंदवल नामक गांव में 10 नवम्बर 1972 को जन्म हुआ था। जन्म के कुछ समय बाद ही माता का देहांत हो जाता है। पिता ही सिर्फ एक सहारा होते है। पिता गांव के ही एक व्यक्ति के खेत में मजदूरी (हलवाही) का काम करते थे। माता के देहांत के बाद पिताजी मजदूरी करने साथ ले जाने लगे। उन्हें पीठ पर बांध लेते और खेतों में काम करते रहते थे। जब वह थक जाते हैं तो उन्हें खेत की मेड पर बैठा देते थे।

    रत्नेश कुमार ने बताया हमारे पिता ही प्रथम शिक्षक थे और उनकी पीठ मेरी प्राथमिक पाठशाला। पिताजी ने जीविका का साधन भले नही बनाया लेकिन उनकी ईमानदारी में हमें बहुत कुछ सीखने को मिला। रत्नेश कुमार बताते है कि मेरी लगभग छः वर्ष अवस्था रही होगी जब पड़ोस के बच्चे स्कूल जाते और स्कूल इंटरवल में दलिया लाकर खाते इसे देखकर मुझे भी स्कूल जाने का लालच आया। पिताजी से कहने पर उन्होंने इसलिए मनाकर दिया कि हम मजदूरी करने के लिए जाते है और यह छोटा दुबला पतला बच्चा है कही कोई बड़ा लड़का रास्ते मे मारपीट न कर ले।

    उन्होंने बताया पिताजी के मना करने पर कभी कभार पड़ोस के बच्चों के साथ चुराकर स्कूल जाने लगा। जब इंटरवल में मिड-डे मील मिल जाता तब घर वापस आ जाता था। कुछ दिन तो ऐसे ही दलिया के लालच में स्कूल गया। लेकिन जब स्कूल में अन्य बच्चों के पास किताब-तख्ती देखा तब अपने पिताजी से किताब लाने के रट लगाने लगा। पिताजी ने मेरे लिए 10 पैसे की पहाड़े की किताब लाकर दी। बिन मां के छोटे बच्चे को पिता कैसे सम्भालता है यह मेरे पिता जी को बहुत अच्छे से आता था, मेरी हठ और रुदन पर पिता जी मुझे गिनती, पहाड़े, अद्धा पौना सवैया के पहाड़े लोरी की तरह गा गा कर सुनाते जिससे हमने 15 दिनों में ही पहाड़े की पूरी किताब को रट लिया। स्कूल के सभी बच्चे इंटरवल के बाद स्कूल के आंगन में बैठकर गिनती पहाड़ा पढ़ते और पढ़ाते थे। रत्नेश ने बताया जब स्कूल में गिनती पहाड़े सुनाने का हमारा नम्बर आया तब हमने 38 तक पहाड़ा पढ़ाया। उस स्थित में शिक्षक ने देखकर मुझे बुलाया और कहा आपको कितना पहाड़ा आता है। जवाब था गुरुजी 40 तक,गुरुजी को आश्चर्य हुआ कि कक्षा एक का बच्चा जो कभी कभार स्कूल आया है और 40 तक पहाड़ा।

    गुरुजी ने हेड मास्टर से बात किया और 35 पैसे इनाम देकर अगले दिन से कक्षा दो में बैठने की बात कही। अगले दिन भी कुछ ऐसा ही होने पर कक्षा तीन में प्रवेश मिल गया। अब स्कूल के सभी बच्चों में हलचल बढ़ गई। बच्चे अब हमको घेरकर बैठने लगे और कुछ न कुछ पूछते रहते थे। मुझे महज तीन दिनों में कक्षा 3 का मॉनिटर नियुक्त किया गया। किसी तरह कक्षा पांच की परीक्षा तो पास कर लिया। लेकिन कक्षा छः में पहुंचने पर पिता क्षय रोग से पीड़ित होकर बिस्तर पर आ गये। पिताजी की दवाई से लेकर पढ़ाई और खाने की अब सारी जिम्मेदारी हमाारे कंधों पर आ गयी। पिताजी की जगह हम स्वयं हल जोतने जाने लगे। लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी और कक्षा 8 की परीक्षा जनपद में प्रथम स्थान में पास किया।

    कक्षा 8 पास करने के बाद गांव से 13 किलोमीटर दूर जाना था। पिताजी की दवा, घर का खर्च और दूरी होने के कारण साइकिल की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। उस दिन मैं बहुत मायूस था, जिसने जनपद में कक्षा आठ (बोर्ड परीक्षा) प्रथम स्थान पर पास की हो। वह गरीबी के हालात में कक्षा 9 में प्रवेश नही ले पा रहा हो। उस स्थित में गांव के बालेश्वर कुमार सिंह जो फतेहचंद्र जगदीश राय इंटर कॉलेज सफदरगंज के छात्र थे, कालेज से कक्षा 9 की प्रवेश परीक्षा का फार्म लेकर मुझे दिया। किसी तरह विद्यालय में प्रवेश तो लिया लेकिन पढ़ाई करना आसान नहीं रहा। पिताजी का इलाज और कॉपी किताब आदि जुटाना यह सब आसान नहीं था।

    उन्होंने बताया इस स्थिति में हमने अहमदपुर स्थित भट्ठे पर काम करना शुरू किया। कबाड़ी से एक पुरानी साइकिल खरीदी। ईट भट्टे पर काम करते हुए सन 1990 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास किया।स्नातक की पढ़ाई के लिए जवाहर डिग्री कॉलेज बाराबंकी में नाम तो लिखवाया लेकिन नियमित कालेज नही जा पाया। पिताजी के दवा और घर को चलाने के लिए मुश्किलें बढ़ गई। गांव से 28 किलोमीटर दूर स्थित बाराबंकी के आवास विकास कालोनी की पानी की टंकी के नीचे व फुटपाथ पर सो जाता और छाया चौराहा, सतरिख नाके की लेबर मंडी में खड़े होकर बिकता तथा दिन भर मजदूरी करके जो पैसे मिलते उससे पिता जी का इलाज और अपना पेट भरने का काम कर लेता था। हो मेरा सहारा बनी।

    कभी कभार स्कूल भी चला जाता था। इसी बीच एक मित्र के कहने पर नौकरी के नाम पर दिल्ली चला गया। वहां नौकरी तो नही मिली मिली और बीमार हो गया। बीमार होने पर मेरा दोस्त मुझे अस्पताल छोड़कर भाग गया। दिल्ली में कई कई दिन भूखे रहना पड़ा, नागलोई में एक मंदिर के सामने रुकता था और मिलने वाले प्रसाद से भूख मिटाता। वापस आने के लिए टिकट के पैसे नही थे। कभी सुना था कि 15 अगस्त के दिन टिकट की जांच नही होती है, सो इसी गलतफहमी में 15 अगस्त को बिना टिकिट ट्रेन से कानपुर आ गया। कानपुर में दो माह मजदूरी करने के बाद घर वापस आया। पिता जी पुत्र वियोग में और बीमार हो गये थे।

    उन्होंने बताया फिर से हमने दवा चालू की। वह पैसे जल्द ही खत्म हो गये। पिता जी लम्बे समय तक बीमार रहने के बाद उनका देहांत हो गया। बटाई में मजदूरी पर लिए गए वह खेत भी अब दूसरे लोगो ने ले लिया था। वह भट्टा भी बंद हो गया था जहाँ पर काम किया करता था। स्थित में तहसील राम सनेहीघाट में जाकर कुछ टाइपिंग के काम को सीखने की कोशिश की, इसी बीच पांच अक्टूबर 1994 को स्वयंसेवी संस्था पारिजात युवक समिति के अध्यक्ष राम नरेश रावत और उपेंद्र सिंह रावत से मुलाकात हुई।

    संस्था के लोगो ने बताया कि सम्पूर्ण साक्षरता अभियान से जुड़ें, फिर क्या सम्पूर्ण साक्षरता अभियान में वॉलिंटियर टीचर व मास्टर टीचर बना। संस्था की सदस्यता ली। एक साल के प्रशिक्षण में सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक आर्थिक और राजनैतिक बदलाव के लिए तैयार हुए। स्कूल वंचित क्षेत्रों में पारिजात विद्यापीठ नाम से स्कूलों की स्थापना करने की मुहिम शुरू की। संस्था ने यूनीसेफ की मदद से नवम्बर 1999 से सिरौलीगौसपुर विकास खण्ड के घाघरा की तलहटी के स्कूल से वंचित 30 गांवों में वैकल्पिक शिक्षा केंद्रों का संचालन किया, इन केंद्रों को संचालित कराने का दायित्व मैने लिया और क्षेत्र के 3500 शिक्षा से वंचित बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का काम किया गया। बड़ी उम्र की बालिकाओं के लिए पहला कदम नाम से आवासीय ब्रिजकोर्स संचालित किये जिसमे 10 से 14 वर्ष की बालिकाओं को एक वर्ष में कक्षा 5 तक पढ़ा कर कक्षा 6 में प्रवेश दिलाकर मुख्यधारा से 400 बालिकाओं को जोड़ा।

    उन्होंने बताया इस योजना को यूनिसेफ से जुड़े करीब आठ से 10 देशों के अम्बेसड़र, स्विट्जरलैण्ड, फ्रांस, हांड्रूज नेपाल के प्रितिनिधियो व डेनमार्क की राजकुमारी सहित भारत सरकार के शिक्षा सचिव सहित कई अधिकारियों ने अवलोकन किया। चार प्रदेशो की दूरदर्शन टीमो व फिल्म निर्माता महेश भट्ट अपनी टीम के साथ हमारे द्वारा किये गये कार्यों की डॉक्यूमेंट्री फिल्म तैयार की गई। जिसे टेलीवीजन पर दर्शाया भी गया।

    उन्होंने बताया प्रदेश में जब सर्व शिक्षा अभियान के तहत वैकल्पिक शिक्षा केंद्र अन्य गैर आवासीय ब्रिजकोर्स की योजना शुरू की गई तब निदेशक साक्षरता एवं वैकल्पिक शिक्षा उत्तर प्रदेश से मुझे बुलाकर निदेशालय का सलाहकार बना दिया। सलाहकार के पद पर नौकरी करने के दौरान ही 28 दिसंबर 2005 को पिताजी की स्मृति में बेसिक उत्थान एवं ग्रामीण सेवा संस्थान की स्थापना की। इसके साथ ही गांव में ही नौकरी के पैसे से कुछ जमीन खरीदकर चाइल्ड फ्रेंडली स्कूल की स्थापना कर गांव के गरीब बच्चों को उत्कृष्ट निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की।

    इस स्कूल से गांव के और पड़ोस के गांवों के 250 बच्चे प्रतिवर्ष मुफ्त में शिक्षा ग्रहण करते है। गांव के बच्चों की शिक्षा व्यवस्था करने के साथ ही अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाया, शिक्षा शास्त्र से परास्नातक और बीएड किया । सात वर्षों तक शिक्षा निदेशालय में नौकरी करने के बाद त्यागपत्र देकर संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति में लग गए।संस्था द्वारा बुजुर्ग और अनाथ बच्चों को 31 माह से मुफ्त में भोजन पहुंचाया जा रहा है। बचपन जिस संघर्ष में बिता उसी मुसीबत वाले बच्चों की सहायता के लिए चाइल्ड लाइन 1098 हेल्पलाइन संचालित कर अब तक 5 हजार से अधिक बच्चों को संरक्षण और सहारा दिया है। बच्चों के कल्याण के कार्यों देखते हुए रत्नेश कुमार को न्यायालय बाल कल्याण समिति के सदस्य पद पर चयन हुआ। रत्नेश कुमार की पहचान मुसीबत में फंसे बच्चो के मददगार के रूप में है।

    उन्होंने बताया यह सब हमारे करने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि हमने जिस तरह से कष्ट उठाया है अब किसी दूसरे बच्चे को न उठाना पड़े। इसलिए मैं हर वक्त सिर्फ बच्चों और बुजुर्गों के बारे में सोचता रहता हूँ। आज विप्पति के समय जब बच्चो को देखता हूँ तो उसकी मदद के लिए दौड़ जाता हूँ।

    उन्होंने कहा यह हमारी सफलता नही हमारा मिशन है। जब तक शरीर में जान है, समाज के बच्चों और बुजुर्गों के लिए काम करता रहूंगा। आज मेरे माता- पिता नही है। लेकिन जब भी मैं किसी बुजुर्ग माता-पिता को देखता हूँ तब उन्हें अपने माता-पिता समझकर स्नेह सम्मान देता हूँ और उनकी मदद करता हूँ। उन्होंने बहुत ही भावुक होकर कहा काश मेरे माता-पिता होते बहुत अच्छा लगता। लेकिन समय को कोई नही बदल सकता है। हमारा प्रत्येक व्यक्ति के लिए यही संदेश है कि सभी लोग अपने माता-पिता को ही भगवान मानकर पूजा-सेवा करे। बच्चो के प्रति आपका वात्सल्य, बुजुर्गो के प्रति सम्मान ईश्वरत्व प्राप्ति का मार्ग है।

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    1 Comment

    1. Kapil Yadav on June 5, 2020 9:32 pm

      Very good

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