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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    सूखे कुएँ तुम्हारा इम्तहान बाकी है

    By April 26, 2020 Current Issues No Comments2 Mins Read
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    जमीन जल चुकी है आसमान बाकी है
    सूखे कुएँ तुम्हारा इम्तहान बाकी है
    बरस जाना वक़्त पर हे ** मेघ **
    किसी का मकान गिरवी है किसी का लगान बाकी है

    अपनी प्यास बुझाकर देखिए, आत्मा तक तृप्त हो जाएगी

    रेगिस्तान में हाथ से गड्ढा खोदकर पानी निकालना और फिर थिर जाने के बाद उसे पीना, वैसा ही सुख देता है जैसा किसी स्त्री को मां बनने पर होता है।

    दोनों ही स्थितियां जीवन का सृजन करती हैं। पानी शरीर में प्राण का संचार करता है और स्त्री ईश्वर की सृष्टि रचना के विधान को गति देती है।

    नदियों के सूख जाने पर बीच-बीच में जो टापू बन जाते हैं, वहां गड्ढा खोदकर पानी निकाला जा सकता है। पानी निकालने की यह प्राकृतिक क्रिया है। कभी अर्जुन ने धरती पर तीर मारकर भीष्म के लिए गंगा प्रकट कर दी थी, हमने गंगा को पाने के लिए अपने हाथों को जहमत दी। गंगा प्रकट हुईं और अपना आशीष देकर हमें अभिसिंचित किया।

    गंगा के इस क्षेत्र में आमतौर पर ये जो पानी के लिए गड्ढे खोदे जाते हैं, इनसे तरबूज और खरबूजा के खेतों की सिंचाई की जाती है। ये गड्ढे थोड़ा बड़े आकार के होते हैं। इतने बड़े कि इसमें एक आदमी बहंगी पर दो घड़े बांधकर उतर सकता है। किसान कंधे पर बहंगी रखकर गड्ढे से पानी भरता है और पौधों को पानी देता जाता है। इन प्राकृतिक कुओं को “चुहिला” कहते हैं।

    चित्र में ये शामिल हो सकता है: पौधा, फूल, बाहर और प्रकृति

    इसके अलावा हाथ से छोटे-छोटे गड्ढे भी खोदकर पानी पिया जा सकता है। ये साफ पानी के प्राकृतिक सोते होते हैं। हां, किसी-किसी चुहिला से मछली की सी गंध भी आती है। वो इसलिए कि गंगा में मछलियां भी खूब होती हैं। जब ये मर जाती हैं तो रेत में दब जाती हैं। और जब चुहिला खोदा जाता है तो उसमें इनकी गंध चली आती है। फिर भी गंध इतनी असहनीय भी नहीं होती कि पानी न पिया जा सके।

    यह बात ध्यान रखने योग्य है कि थार और सहारा जैसे मरुस्थल में इस तरह हाथ से खोदकर पानी नहीं निकाला जा सकता। गंगा के रेगिस्तान में पानी रेत की सतह से थोड़ा ही नीचे होता है, जो थोड़ी मेहनत के बाद हासिल हो सकता है।

    हमने तो अपने हिस्से का पानी चुहिला से हासिल कर लिया, कभी आपको भी अवसर मिले तो इस तरह पानी निकालकर अपनी प्यास बुझाकर देखिए, आत्मा तक तृप्त हो जाएगी।

    • विनायक राजहंस 

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