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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    मोदी से तृणमूल व वामपंथी को मुश्किल क्यों ?

    ShagunBy ShagunMarch 27, 2021 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री

    यदि कोरोना महामारी ना होती तो नरेंद्र मोदी एक वर्ष पहले ही बांग्लदेश कि यात्रा करते। उनको बंगबंधु की जन्मशताब्दी समारोह में बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया गया था। कोरोना महामारी व लॉक डाउन के कारण यह कार्यक्रम आगे बढ़ाया गया था। इसकी जो तिथि तय हुई उसी समय पश्चिम बंगाल में चुनाव चल रहा है। वैसे नरेंद्र मोदी ने इस संदर्भ में कुछ भी नहीं कहा। लेकिन पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस,वामपंथी व कांग्रेस सभी आशंकित हो गए। बांग्लदेश की कम्युनिस्ट पार्टी ने मोदी के विरोध में हंगामा किया। वैसे जिन देशों में वामपंथी सरकारें है, वहां लोगों को मूलभूत धार्मिक अधिकार प्राप्त नहीं है। चीन का उदाहरण सामने है। लेकिन अन्य प्रजातांत्रिक देशों में कम्युनिस्टों व कट्टरपंथियों की जुगलबंदी परवान पर रहती है।

    भारत में पश्चिम बंगाल और केरल में भी यह नजारा आम रहा है। पश्चिम बंगाल से तो इनकी विदाई हो गई। इनकी जगह तृणमूल कांग्रेस आ गई। उसने भी सेक्युलरिज्म के इस अंदाज को जारी रखा। केरल में अभी वामपंथी वर्चस्व है। यहां भी वोटबैंक की सियासत चरम पर रहती है। गणतंत्र दिवस पर लाल किले का उपद्रव भी सामान्य नहीं था। भारत के किसान ऐसा कार्य नहीं कर सकते। लेकिन यह सब किसानों के नाम पर किया गया। ताजा उदाहरण बांग्ला देश का है। बांग्लादेश की स्थापना का अर्द्ध शताब्दी व इसके संस्थापक बंगबंधु की जन्म शताब्दी ऐतिहासिक अवसर था।

    कोरोना संकट व लॉक डाउन के कारण इसको निर्धारित समय पर नहीं मनाया गया। फिर भी बांग्लादेश में इसको लेकर उत्साह था। सरकार ने भी इस जनभावना के अनुरूप भव्य आयोजन निर्धारित किये थे। इसमें भारतीय प्रधानमंत्री से बेहतर कोई अन्य मुख्य अतिथि नहीं हो सकता था। भारत मे संवैधानिक शासन व्यवस्था है। सरकार में निरंतरता रहती है। बांग्लादेश को जब भारत ने पाकिस्तान से आजादी दिलाई,उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी। आज नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वही देश का प्रतिनिधित्व करते है। नरेंद्र मोदी विधिवत निर्वाचित प्रधानमंत्री मात्र नहीं है। वह वर्तमान समय में देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता भी है। इस बात का अनुभव यहां के विपक्षी नेताओं को भी है। भले ही इसको स्वीकार करने में उन्हें संकोच होता है।बांग्लादेश ने अपने इस राष्ट्रीय पर्व पर भारत का प्रतिनिधित्व तय किया।

    स्वभाविक रूप से नरेंद्र मोदी को ही आमंत्रित किया गया। मोदी के साथ बांग्लादेश संबन्धी एक अन्य संयोग भी जुड़ा है। इसका उल्लेख नरेंद्र मोदी ने स्वयं किया। उन्होंने बताया कि वह भी बीस बाइस की उम्र में बांग्लादेश के मुक्ति आंदोलन से जुड़े थे। इसके लिए उनको जेल भी जाना पड़ा था। इस प्रकार बांग्लादेश की आजादी की पचासवीं वर्षगांठ से नरेंद्र मोदी का स्वभाविक लगाव भी है। इसके अलावा बांग्लादेश में मां काली और मतुआ मंदिर में पूजा अर्चना की उनकी पहले से अभिलाषा रही है। उन्होंने इसका उल्लेख भी किया था। इस प्रकार उनकी यात्रा का व्यापक उद्देश्य था। बांग्लादेश के साथ अनेक समझौते भी प्रस्तावित थे। उनको भी मंजिल तक पहुंचाना था। ऐसे में नरेंद्र मोदी की इस यात्रा का स्वागत ही होना चाहिए था। बांग्लदेश के आम लोग भी उनकी यात्रा से उत्साहित थे। लेकिन अनेक देशों में देखा गया कि कम्युनिस्ट अक्सर राष्ट्रीय सहमति से अलग रहते है। बांग्लादेश में कट्टरपंथी भी उनके साथ थे। इन्होंने नरेंद्र मोदी की यात्रा का विरोध किया। कई दिन तक उपद्रव किये गए।

    दूसरी ओर नरेंद्र मोदी के दौरे को लेकर बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमन का बयान सच्चाई को उजागर करने वाला था। उन्होंने कहा कि यात्रा का फोकस उत्सव है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और प्रधानमंत्री मोदी कूटनीतिक को ऐसी ऊंचाई पर ले गए हैं। हम बातचीत और चर्चा के माध्यम से सभी महत्वपूर्ण मुद्दों को हल कर रहे हैं। बगैर गोली चलाए,हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर रहे हैं।

    बांग्लादेश के साथ मजबूत संबंध के कारण भारत की पूर्वी सीमा सुरक्षित है। यह बात उपद्रवी कम्युनिस्ट व कट्टरपंथियों को समझनी चाहिए। भारत के कारण बांग्लदेश की पूर्वी सीमा सुरक्षित है। मतलब साफ है। उसकी सीमा पर पाकिस्तान होता तो निरन्तर अशांति व हिंसा का ही माहौल बना रहता। वस्तुतः बांग्लदेश की कम्युनिस्ट पार्टी के तार पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े है। वैसे भी यह विचार राष्ट्रीय सीमा को महत्व नहीं देता। यदि कोई दूसरा कम्युनिस्ट देश इनके यहां आक्रमण करता है,तो ये अपने देश की जगह दुश्मन के प्रति ही सहानुभूति रखते है। पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है। इन्होंने अघोषित रूप में अपने को तृणमूल कांग्रेस की बी पार्टी बना लिया है। इन सबको लगता है कि नरेन्द्र मोदी का बांग्लदेश में मां काली की पूजा करना,मतुआ मंदिर में पूजा करना,मतुआ समाज के लोगों से संवाद करना बंगाल चुनाव को प्रभावित कर सकते है। शायद इसलिए इन्होंने बांग्लदेश में कई दिन तक उपद्रव किया।

    लेकिन ऐसा नकारात्मक विरोध नरेंद्र मोदी व लाभान्वित करता है। वह ऐसे विरोध की चिंता भी नहीं करते। अपनी दो दिवसीय यात्रा के दौरान, नरेंद्र मोदी जशोरेश्वरी काली मंदिर और ओराकंडी गए। जशोरेश्वरी काली मंदिर के पुजारी दिलीप मुखर्जी ने उनकी यात्रा से पहले कहा था कि यहां सभी लोग उत्साहित है। उनके स्वागत की पूरी तैयारी कर ली हैं। हम आशा करते हैं कि वह भारत और बांग्लादेष के लाखों लोगों के लिए प्रार्थना करेंगे। यह अति प्राचीन हिंदू मंदिर है। यह इक्यावन शक्तिपीठों में से एक है। नरेंद्र मोदी मतुआ समुदाय के लोगों से भी मिले। वह गोपालगंज के ओराकंडी जाएंगे। यहां उन्होंने मतुआ समुदाय के सबसे बड़े तीर्थ स्थल ठाकुरबाड़ी में दर्शन किया।

    नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश में मतुआ मंदिर में की पूजा करने के बाद कहा कि मैं आज वैसा ही महसूस कर रहा हूं,जो मेरे लाखों भाई बहन ओराकांडी आकर महसूस कर हैं। भारत बांग्लादेश के ओराकांडी में ओराकांडी में एक मिडिल स्कूल को आधुनिक मिडिल व प्राथमिक स्कूल खोलेगा। ओरकांडी में ही मतुआ समुदाय के अध्यात्मिक गुरु हरिचंद ठाकुर का जन्म हुआ था। हरिचंद गुरुचंद मंदिर में पूजा की जहां उनका स्वागत स्थानीय परंपरा के मुताबिक,धाक,शंख और उलू’से किया गया। ओराकांडी मतुआ समुदाय का मूल स्थान है। इस समुदाय के लोग बड़ी संख्या में पश्चिम बंगाल में रहते हैं। अपनी यात्रा से पहले मोदी ने कहा था कि वह ओराकंडी में मतुआ समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के लिए उत्सुक हैं,जहां श्री श्री हरिचंद ठाकुर ने अपने पवित्र संदेशों का प्रसार किया था।

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