सियासत के संन्यासी भी आज के दौर से चिंतित: राम प्रताप गुप्ता

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विशेष संवाददाता कमलेश कुमार द्वारा पूर्व वरिष्ठ सपा नेता राम प्रताप गुप्ता से आज की सियासत के दौर की महत्वपूर्ण चर्चा के कुछ अंश
  • बाँदा जिला में आपका एक दौर था, 1989-1999 के बीच का जब आप यहाँ के बड़े सियासतदारों में गिने जाते थे, आप राजनीति से अचानक क्यों ओझल हो गये? और इस लोकसभा चुनाव में पुनः आपको सक्रिय देखा जा रहा है। तब की राजनीति और आज की राजनीति में आप क्या अंतर देखते हैं?
आज देश में चलायी जा रही झूठी लहर इतनी मनभावनी है कि अधिकांश लोग इसमें मंत्रमुग्ध हुए पड़े हैं।
नफ़रत और ईर्ष्या का एक मजबूत वातावरण तैयार कर उसमें राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का काम किया जा रहा है। सभी मूलभूत समस्याओं से किनारा बना हुआ है। बस मीडिया मैनेजमेंट से ही सब मैनेज किया जा रहा है। काश! इतना काम जमीन पर होता तो मीडिया मैनेज की जरूरत ही न पड़ती। देश किधर जा रहा है? ये जो दौर देश में चल रहा है, देश को पुनः दुःखदायी इतिहास में लिये जा रहा है। हिन्दू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित, दलित-पिछड़ा, पिछड़ा-सवर्ण, इनमें आपस में नफ़रत के बीज बोकर ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर निरंतर प्रगति की जा रही है। देश के कई हिस्सों में मानवता को कलंकित करने वाली कई सामंतवादी ताकतें फिर दशानन के सिरों से पुनर्जीवित हो रही हैं। इस अव्यवस्था से जंग का आगाज कई महापुरुषों की अगुवाई में हुआ भी, कुछ सफलतायें भी हाथ आईं लेकिन पुनः सब कुछ जैसे भूतकाल में जा रहा हो।
हमने भी इस अव्यवस्था के खिलाफ हमारे मुखिया मुलायम सिंह जी के नेतृत्व में बाँदा जिला में जंग छेड़ी थी। सभी खाटी समाजवादी घरों में छोटे-छोटे बच्चों और पत्नी को अकेले छोड़कर समाजवाद की विचारधारा बुलंद करने के लिये दिनोंदिन जेल में भी काटे हैं। कुछ ही सालों में हम समाजवादियों की मेहनत रंग लायी मानो पिछड़ों और वंचितों के लिये नया सवेरा मिल गया हो, नई उम्मीदों को पर मिल गये हों, एक नई दुनिया जिसमें सामंतवादी और मनुवादियों की क्रूरता नम्रता में तब्दील होती नजर आयी। 80 के दशक से सक्रिय राजनीति इसी परिवर्तन को देखने के लिये थी। रही-सही कसर बहन मायावती जी ने 1993 से पूरी करनी शुरू कर दी। जिले और सूबे में सब कुछ सामान्य सा हो रहा था। समाजवाद अपनी परिभाषा को चरित्रार्थ कर रहा था।
जिले में हमारे परम मित्र व बड़े भाई डाॅ. सुरेंद्रपाल वर्मा जी (पूर्व मंत्री) और दादा रामसजीवन जी( पूर्व सांसद) भी हम सभी की ताकत बनें क्योंकि हम लोग लड़ रहे थे समांतवादी और मनुवादी ताकतों से। हमारे जैसे कई सिपाही हर जिले में धरतीपुत्र मुलायम सिंह जी के नेतृत्व में इस अव्यवस्था के खिलाफ जंग छेड़े थें। सूबे में सफलतायें दिखने भी लगीं। बाँदा में भी कस्बों, शहरों व कई गाँवों में भी परिवर्तन होता दिखाई दिया। वंचित, शोषित और छोटी जातियों को भी संविधान में मिले बराबरी के दर्जे का एहसास होने लगा।
खाटी समाजवादी सत्येंद्र यादव , शिवमंगल सिंह चौहान, उदय यादव, इम्तियाज खान, इंद्रजीत यादव , शानिया खान, इमरान अली राजू, शमीम बाँदवी एवं और कई समाजवादी साथियों ने निःस्वार्थ रूप से जिले में समाजवादी विचारधारा को मजबूत किया है।
फिर एक मोड़ ऐसा आया की इस राजनीति से मोह भंग होने लगा और सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिये। इसकी मुख्य वजह थी हमारी अव्यवस्थाओं के खिलाफ ठानी जंग का विजयी परिणाम दिखने लगा दूसरा हमारे साथी बड़े भाई वर्मा जी का यूँ हम सबका साथ छोड़ जाना।
सक्रिय राजनीति को छोड़े बीस साल हो गये। लेकिन आज देश में फिर पिछले दौर से खतरनाक मंजर दिख रहे हैं। तब के दौर में सामंतशाही और मनुवादी व्यवस्था ही अपने से निम्न समझी जाने वाली जातियों का शोषण करती थीं किन्तु आज फिर इसके पुनर्जीवित होने के साथ-साथ हिन्दू-मुस्लिम का राग गुलामी के काल की याद दिलाने लगा। इन सब भयावह भविष्य को देखते हुए आज फिर कई पुराने साथी जो सक्रिय राजनीति से बाहर थे उम्र के उस पड़ाव पर भी हैं जहाँ शरीर का ढाँचा, हड्डियाँ और ताकत जल्द जवाब दे जाती है एकजुट होकर पुनः इस अव्यवस्था के खिलाफ जंग छेड़ दिये हैं।
जिले में समाजवाद के सभी पुराने साथी लोकतंत्र के सबसे बड़े हथियार मत की सहायता से यह बाजी पलटेंगे। जगह-जगह जाकर लोगों को सच्चाई से अवगत कराने का कार्य भी शुरू हो गया है। मीडिया के बनाये जनमत को हमें सच्चाई से बदलना होगा। तभी फिरकापरस्ती ताकतों के सामने मुकाबिल हो सकते हैं। हम लोग अब बिना राजनीति में सक्रिय हुए व्यक्तिगत तरीकों से ही पुनः समाजवाद की जड़ों को मजबूत करने में लगे हुए हैं।
हमें तो बस यह ललक आज भी है –
समाजवाद ही प्रथम ध्येय हो।
मानवता का प्रखर तेज हो।।
  • आप आज की समाजवादी पार्टी और आपके वक्त की समाजवादी पार्टी में क्या फर्क देख रहे हैं। और आप महागठबंधन को कितना उचित मान रहे हैं।
पहले की समाजवादी पार्टी में मिशनरी कार्यकर्ताओं का व जमीनी नेताओं का वर्चस्व था और सभी वर्गों का एक बैलेंस अनुपात था और उसका ध्येय वास्तव में समाजवाद ही था किन्तु अब थोड़ा सा बदलाव समझ आ रहा है ट्विटर और फेसबुक पर दिन रात काम करने वाले नेता बेहतर माने जाते हैं और केवल जमीन पर काम करने वालों तक हाईकमान की नज़र नहीं पहुँच पाती। लगभग सभी दलों में यही हाल है। अखिलेश बेशक विकास के नायक के तौर पर देखे जाते हैं पर उन्हें माननीय नेता जी की राजनीति से और भी बहुत कुछ सीखना है। रही महागठबंधन की बात तो समान विचारधाराओं का मिलकर फिरकापरस्तियों से लड़ना बिल्कुल वाजिब है। हाँ! यूपी में बेजान पड़ी बसपा के लिये यह महागठबंधन संजीवनी का भी काम करेगा जिससे दोनों सपा-बसपा (सब) मिलकर देश की बड़ी ताकत बन सकते हैं और समाजवाद पुनः अपनी प्रबलता की ओर बढ़ सकता है।

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