P1- जुमलेबाज या निगहबान?

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राहुल कुमार गुप्त 
विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के विकास व प्रगति के लिये जो गति आजादी के बाद से मिलनी चाहिये थी वो कई निम्न वजहों से नहीं मिल सकीं। लेकिन जितनी गति मिली वो भी अपर्याप्त तो कतई न थी। किन्तु इन्हीं बीच देश के राजनेताओं से लेकर आम सरकारी कर्मचारियों को छूत की बीमारी भ्रष्टाचार की लग गयी। लोकतांत्रिक देश में वंशवाद व परिवारवाद का राजतंत्रात्मक रोग लग गया। जनता भ्रष्टाचारों और घोटालों से आजिज आ चुकी थी, इसी बीच सन् 2013 के मध्याह्न से एक नाम देश के चहुँओर सूर्य की रोशनी की तरह फैल गया। लोगो की उम्मीदें ‘दिन दूनी रात चौगुनी’ हो गयीं। और देश में बीजेपी नहीं मोदी युग की शुरूआत हो गयी। यह नरेन्द्र दामोदर दास मोदी है कौन? लोगों को कुछ हद तक पता था कि गुजरात के हिन्दूवादी मुख्यमंत्री। किन्तु धीरे-धीरे इससे पूर्व क्या थे, इसकी भी जानकारी लोगों को होने लगी। उनके बचपन का भावनात्मक पक्ष भी लोगों के दिलों में उन्हें मजबूती देता गया।

”वो समाज की मुख्य धारा से बाहर था।
वो नन्हा बालक कुछ छूत-कुछ अछूत था।।
भेदभाव की कंटीली खाईयों से,
उसका बचपन गुलजार था।
उस नन्हे मन में इंकलाब का,
पल रहा तूफान था।।
वो बढ़ता गया जिल्लत से जिंदगी,
और जिंदगी से जीत की ओर।
अपने हाथों की लकीरों को बदलता,
सम्पूर्ण भारत की ओर …..”

शासन की बागडोर विरासत में पाने वालों का इतिहास उतना ही पुराना है जितना की आदम सभ्यता। भारत में इस परम्परा को अमरत्व प्राप्त है। शासन में वंशवाद व परिवारवाद जहाँ राजतंत्र को जिंदा रखे हुए है वहीं देश के लोकतंत्र, अमन-चैन व विकास के लिये परोक्ष रूप व कभी-कभी प्रत्यक्ष रूप से अवरोधक ही हैं।
ऐसे में गुजरात के वडनगर के एक साधारण पिछड़े वर्ग के परिवार का एक किशोर देश की अव्यवस्थाओं को बदलने की इच्छाशक्ति के साथ गृहस्थ जीवन का त्याग कर ऐसा संन्यासी बनने निकल पड़ता है जो इन अव्यवस्थाओं को हकीकत में बदल सके। हिमालय की राह न चुनकर राजनीति के दलदल भरी राह चुनी। क्योंकि लोकतांत्रिक देशों में राजनीति की राह ही ठोस परिवर्तन ला सकती हैं।
सामाजिक व आर्थिक विषमताओं के अग्निपथ को पार कर वह आम नागरिक आज ‘मोदी’ के नाम से विश्व विख्यात है।
वर्ष 2013 के मध्याह्न से ही यह नाम भारत के शहर-शहर व गाँव-गाँव में गूँजने लगा। ” हर-हर मोदी। घर-घर मोदी।।” का यह स्लोगन जल्द ही हकीकत में दिखने भी लगा।
एक अरब से ज्यादा की आबादी वाले इस देश में ऐसा कोई घर व शख्स नहीं जो इस ‘मोदी’ नाम को अपनी जुबाँ पे लाता न हो।
तानाशाह, हिटलर, जुमलेबाज, सपनों का सौदागर, पूँजीपतियों का मित्र, साम्प्रदायवादी आदि तंज जहाँ विरोधियों द्वारा कसे जाते हैं वहीं भारी समर्थकों के द्वारा सच्चा जनसेवक, पथ-प्रदर्शक, ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ आदि बेहतरीन शब्दों का विशेषण भी दिया जाता है। रोज-रोज नये कार्यों में सक्रिय रहने की वजह से सभी के मन में वो अनायास ही बने रहते हैं।
मोदी जी द्वारा देश की बागडोर संभालने के पहले ही संपूर्ण भारत में दो धूरियाँ भी बन चुकीं थीं। दो विचारधाराओं ने जन्म ले लिया था। इन धूरियों को और मजबूती मिली जब मोदी जी अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान देश में परिवर्तन की बयार लाने के लिये सख्त निर्णयों को अमल पर लाने लगे। कृत्रिम परिवर्तन का कोई भी दौर हो वो सदैव कष्टकारी ही होता है।
जबकि स्वतः परिवर्तन जो कि प्राकृतिक होता है वो कष्टकारी समझ में नहीं आता। लेकिन देश में स्वतः परिवर्तन से विकास या अमन-चैन नहीं आना उसके लिये मानव द्वारा बनाये गये नियमों अर्थात कृत्रिम नियमों द्वारा परिवर्तन लाना ही लाज़िमी है।
कई सालों से सत्ता से दूर अगड़ी जातियों ने सोशल मीडिया पर मोदी थीम को हाई-फाई करने के लिये वाजिब और गैर वाजिब दोनों तरीकों का इस्तेमाल किया। जिससे अन्य जातियों व विरोधियों में विरोध के सुर में तीव्रता बनी रही। और उनमें जुमलेबाज के रूप में मोदी शुमार होने लगे। शुरुआती दौर में बढ़ती मॉब लिंचिंग की घटनाएं भी लोगों में दहशत उत्पन्न करती रहीं। यह मॉब लिंचिंग की घटनायें पूर्व प्रायोजित कतई नहीं थी। यह घटनायें अन्य पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा तुष्टीकरण की हदों से उत्पन्न आमजन के प्रतिरोध की घटनायें हैं, जो कि न्यायोचित कदापि नहीं हो सकतीं। यह इस सरकार में दाग के रूप में इसलिये उभरी की कहीं न कहीं वह भीड़ सत्तासीन लोगों की समर्थक रही।
मोदीजी ने इस पर सख्ती दिखाते हुए राज्य सरकारों व अधिकारियों को सचेत भी किया। राज्य शासन ने इन भीड़तंत्रों को काबू में करने के लिये अपने ही समर्थकों पर सख्त कार्यवाही भी की है।
विपक्ष अपने तत्कालीन सत्ता के कर्मों को याद करता और न्यूटन के क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम याद रखता तो ऐसे मामलों का दोषी वो खुद को पाता।
किन्तु विपक्ष इन्हें मुद्दा बनाकर जन सहानुभूति का अधिकारी बनने में लगा हुआ है।
एक सम्प्रदाय के प्रति ज्यादा तुष्टीकरण ही सम्प्रदायवाद है और यह सभी राजनीतिक दल करते चले आये हैं। बस सम्प्रदाय भिन्न था!
जहाँ गैर बीजेपी दल मुस्लिम तुष्टीकरण में खुश थे वहीं बीजेपी सभी के विकास का वादा करती रही और सबके हित के लिये कई कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन किया। हाँ! वर्ग विशेष के तुष्टीकरण से दूर रही। बस बीजेपी की योजनाएं बुद्धिजीवियों व कुछ हिन्दुओं को रास आने की वजह से उसमें कुछ विरोधियों को साम्प्रदायिकता नज़र आने लगी।
हजारों मंदिरों को तोड़कर उनमें मस्जिदें बनीं, उनमें से बहुसंख्यकों के आराध्य के मात्र एक मंदिर बनाने की माँग से भला उसे साम्प्रदायिकता में कैसे तौला जा सकता है। वो भी मोदी सरकार का शीर्ष नेतृत्व इस विषय में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार कर रहा है। अगर यह नेतृत्व जब चाहे इस मसले पर अध्यादेश लाकर बहुसंख्यकों की भावनाओं को राहत दे सकता है। किन्तु सरकार होने के नाते इस मसले को न छूकर वो दोनों पक्षों के विचारों के साथ तटस्थ हैं। तथा पहले से चल रहे इस मुकदमे को न छेड़कर वो न्यायालय के अस्तित्व का भी सम्मान कर रहे हैं।
भला ऐसे में साम्प्रदायिकता का ताना बस एक व्यक्ति व एक दल को देना कहाँ तक उचित है? राममंदिर पर कुछ प्रतिक्रिया न देने पर अधिकांश जन की नज़रों में ये जुमलेबाज के रूप में बने रहे।
 गोधरा कांड के दौरान गुजरात दंगे जो क्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न भीड़ की प्रतिक्रिया का रूप था उसमें राज्य का मुखिया होने के नाते उस पर आँच आना लाजिमी था। अंततः कई कमेटियों की जाँच में इनके खिलाफ सबूत नज़र नहीं आये। इस कांड की वजह से ही एक समुदाय पूरी तरह पूर्वाग्रह से ग्रसित हो गया। लेकिन मोदी सरकार ‘सबका साथ सबका विकास’ स्लोगन के साथ कार्य कर रही है। कई विभिन्न योजनायें इनकी साक्षी रहेंगी। लोकतंत्र में सत्ता एक व्यक्ति से नहीं बल्कि एक दल और एक बड़े जनसमूह के बहुमत से चलती है।
मुख्य नेतृत्व के ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ हो जाने से सम्पूर्ण दल, जन व प्रशासन एकाएक ईमानदार हो जायेगा, ऐसी परिकल्पना कर लेना भी बेमानी साबित होती है।
मुख्य नेतृत्व जब वंशवाद, परिवारवाद, जातिवाद व पंथवाद से परे हो और केवल भारतीयता व भारत का सर्वांगीण विकास ही उसका ध्येय हो तो वह जन अवहेलना का शिकार होते हुए भी  जनहित के लिये बेहतरीन कार्य करने को आतुर रहता है। लेकिन  दूरगामी परिणाम देने वाले यह ठोस निर्णय विरोधियों के लिये मुद्दे के रूप में वरदान का कार्य करने लगते हैं। हाँ! मोदी की भाजपा में शीर्ष स्तर पर न सही पर परिवारवाद की भरमार यहां भी कम नहीं है इस पर भी बहुत लोग परिवारवाद पर मोदीजी के हमले को जुमला ही बताते नज़र आते हैं।
…गतांक से आगे

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