भारतीय कलाओं की गौरवशाली परम्परा

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
राज्यपाल राम नाईक के कार्यकाल में राजभवन अनेक भव्य सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का गवाह बना। राजभवन के द्वार आमजन के लिए भी खोले गए। इसके माध्यम से राम नाईक ने राज्यपाल के कर्तव्यों को नया आयाम भी दिया है। भविष्य में इसे नजीर के रूप में प्रतिष्ठा मिलेगी। ऐसे ही कार्यक्रमों में कलाकारों की कार्यशाला का भी शुमार हुआ। राजभवन में ही पांच दिनों तक यह कार्यशाला चली। उद्घाटन सत्र में राम नाईक उपस्थित नहीं हो सके। उन्हें प्रदेश के बाहर जाना पड़ा। लेकिन वह कलाकारों की सुविधाओं का ध्यान रखने के निर्देश दे गए थे। उनका आग्रह था कि कलाकार राजभवन का भृमण भी करें, अन्य कलाकृतियों के साथ ही इस भवन को भी कैनवास में उकेरे। यह कार्यशाला पूरी भव्यता के साथ समाप्त हुई। समापन सत्र में राज्यपाल ने कलाकारों को सम्मानित किया।
 राजभवन में उत्तर प्रदेश एवं महाराष्ट्र के कलाकारों की पांच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था। इसके चित्रकला सत्र में  राज्यपाल  राम नाईक की विभिन्न मुद्राओं में  केनवास पर उकेरे गए। राज्यपाल ने इसका अवलोकन किया। उनकी सराहना करते हुए कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
राजभवन में आयोजित कला कार्यशाला में दस विख्यात कलाकारों में सांगली महाराष्ट्र से मांगेश आनन्दराव पाटील, औरंगाबाद महाराष्ट्र से नानासाहेब भाउसाहेब येओले, पुणे महाराष्ट्र से  उत्तम रामचंद्र साठे, लखनऊ, उत्तर प्रदेश से अमित कुमार, महाराष्ट्र से मनोज कुमार सकाले, लखनऊ उत्तर प्रदेश से भारत भूषण शर्मा, उत्तर प्रदेश से  कमलेश्वर शर्मा, महाराष्ट्र से  सत्यजीत वारेकर, पुणे महाराष्ट्र से श्रीमती मंजरी मोरे एवं पुणे महाराष्ट्र से  सुरभि  गुलवेलकर प्रतिभाग किया।
 राज्यपाल के अपर मुख्य सचिव  हेमन्त राव ने छह जून को कार्यशाला का उद्घाटन  किया था। चित्रकला कार्यशाला का आयोजन ललित कला अकादमी, नई दिल्ली एवं संस्कार भारती के तत्वावधान में आयोजित किया गया था। उद्घाटन सत्र में ललित कला अकादमी के अध्यक्ष  उत्तम पाचारणे, विशेष सचिव  राज्यपाल डाॅ अशोक चन्द्र, संस्कार भारती के संगठन मंत्री  गिरीश चन्द्र तथा कलाकार उपस्थित थे।  इस कार्यशाला का उद्घाटन राज्यपाल राम नाईक द्वारा किया जाना था परन्तु  प्रदेश के बाहर होने के कारण अपर मुख्य सचिव हेमन्त राव द्वारा उद्घाटन  किया गया था।
 संस्कार भारती के संस्थापक पद्मश्री योगेंद्र जी बाबा ने कहा कि भारत की कला और संस्कृति विश्व मे सर्वाधिक प्राचीन है। अंग्रेजों ने साजिश के तहत यह प्रचार किया कि आर्य बाहर से आये थे। सच्चाई यह है कि जब विश्व मे सभ्यता का जन्म नहीं हुआ था, उसके हजारों वर्ष पहले भारत की सभ्यता पूर्ण विकसित हो चुकी थी। भारत मे आकर लोग ज्ञान प्राप्त करते थे। भारत के लोग विश्व के अनेक हिस्सों में गए। यही कारण है कि विश्व के अनेक देशों में आज भी भारतीय सभ्यता के प्रमाण मिलते है।
योगेंद्र जी बाबा ने अपना पूरा जीवन भारतीय कला की खोज में समर्पित कर दिया। अनेक लोक कलाओं और लोक कलाकरों को वह मुख्यधारा में लाये। इससे विश्व हतप्रभ हो गया। इतनी विविधतापूर्ण कलाएं विश्व में कहीं नहीं है।
हमारे देश के प्राचीन राजा कला और कलाकारों को संरक्षण देते है। विदेशी आक्रांताओं के समय भारतीय कला को बहुत नुकसान पंहुचाया गया। आजादी के बात भी इस पर उचित ध्यान नहीं दिया गया। पिछले कुछ वर्षों से इस दिशा में प्रगति हुई है।
अब हमारे देश मे प्रजातंत्र है। राज्यपाल राम नाईक जनता के बीच ही रहना पसंद करते है। यही कारण है कि उन्होंने राजभवन में कलाकारों की कार्यशाला आयोजित करने की अनुमति दो। पांच दिन की कार्यशाला में वह कई बार कलाकरों के बीच गए। समापन सत्र के एक दिन पहले वह डेढ़ घण्टे तक कलाकारों के बीच रहे।
राज्यपाल ने कहा कि राजभवन में बड़े और छोटे स्तर के अनेक कार्यक्रम आयोजित होते है।
इस सम्मान समारोह के पहले राम नाईक ने एक दलित परिवार के विद्यार्थी को सत्तानबे प्रतिशत अंक आने पर सम्मानित किया था। वह कार्यक्रम एक परिवार तक ही सीमित था। लेकिन इसका सन्देश बहुत व्यापक था। इसी प्रकार कलाकारों का सम्मान भी व्यापक सन्देश वाला है। इसमें भारत की महान सांस्कृतिक विरासत समाहित है। राम नाईक ने राजभवन को व्यवहार में लोक भवन में बदल दिया। उन्होंन कलाकारों और ललित कला अकादमी के आभार व्यक्त किया। कहा कि  कार्यशाला के लिए राजभवन का  चयन सराहनीय है।
उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कलाकार इसमें शामिल हुए थे। राज्यपाल ने कहा कि उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के सांस्कृतिक संबन्ध बहुत गहरे है। अनेक संत हुए जो सभी जगह सम्मानित हुए। शिवजी को छत्रपति की उपाधि काशी के विद्वानों ने प्रदान की। अठारह सौ सत्तावन का संग्राम उत्तर प्रदेश में शुरू हुआ। इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया।
राज्यपाल ने विनोदपूर्ण अंदाज में कहा कहा कि कलाकारों के बीच वर्षों बाद मैं एक पोज में डेढ़ घण्टे यक बैठा। इसमें उन्होंने कलाकारों की साधना भी देखी। भारतीय कला की गौरवशाली परम्परा रहा है। यहां चौसठ प्रकार की कलाओं का विस्तृत बांगम्य उपलब्ध है। जिसे आज के कलाकार आगे बढ़ा रहे है। सभी लोग अच्छे कलाकार नहीं हो सकते, लेकिन कला के प्रति अभिरुचि सभी मे होती है।
राम नाईक ने अपने विद्यार्थी जीवन का उल्लेख किया। उनके पिता गांव के स्कूल में विद्यार्थी थे। वहां कला, चित्रकला , तैलचित्र आदि भी सिखाया जाता था। पच्चीस सूर्यनमस्कार भी करने होते है। कला में एक बार बालक राम नाईक मनुष्य की आंख बनाने का प्रयास किया। सोए हुए मनुष्य का चित्र बनाकर जैसे तैसे काम पूरा किया। राज्यपाल ने कहा कि राजनीति भी एक प्रकार की कला है।
 राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश के कलाकारों को हिंदी और महाराष्ट्र के कलाकारों को मराठी संस्करण की अपनी पुस्तक चरैवेति चरैवेति भेंट की।

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