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    भैया! एक रोटी कम खईहा, मुला जहाँ तक होई सके, आपन घर गांव छोड़िके, अइसन मजदूरी करय का खातिर दोबारा परदेश न जईहा

    ShagunBy ShagunJune 5, 2020 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    अरविन्द कुमार ‘साहू’

    भैया जी, जिस तरह लॉकडाउन का तीसरा चरण शुरु होने के बाद हमारे यूपी, बिहार आदि प्रदेशों के प्रवासी मजदूरों ने वापस अपने गाँव – घर की ओर अन्धा-धुन्ध दौड़ लगायी है वह स्थिति निश्चित रूप से बहुत ही व्यथित करने वाली रही। जिस तरह लोग भूखे, प्यासे, बिना पैसों के, बिना साधन के पैदल ही यात्रा शुरु कर दिये वह तो बेहद कष्टदायी रही है। कितने ही लोग रास्ते में अनेक कारणों से असमय ही काल कवलित हो गये। दुर्घटनाओं के शिकार हुए, शासन – प्रशासन की लापरवाही व असंवेदनशीलता की भेंट चढ़ गये।

    प्रवासी मजदूरों की यह हालत देखकर मेरा ही क्या किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का मन जरुर विचलित हुआ होगा। जिन लोगों ने ऐसी परिस्थितियों को देखा और झेला, उनकी स्वयं की बात तो छोडिए, अब अखबार व टीवी में खबर देखने वाले भी एक दूसरों को जीवन में नसीहत देते फिरेंगे कि भैया! एक रोटी कम खईहा, मुला जहाँ तक होई सके, आपन घर गांव छोड़िके, अइसन मजदूरी करय का खातिर दोबारा परदेश न जईहा ।”


    फिर भी लगता है कि आगे भी कमोबेश यह सिलसिला बन्द होने वाला नही है। इस विषय पर लिखने के लिये वैसे तो बहुत कुछ है, लेकिन अब हम आते हैं गाँव घर की वर्तमान दशा, दिशा और परिचर्चा पर।

    भैया जी! गाँव के लोग अक्सर कहते हैं कि उन्हें खेतों में मजदूरी और अन्य काम धन्धों के लिये -300/-प्रतिदिन में भी मजदूर नहीं मिलते। यानी इससे यह भी समझा जा सकता है कि यहाँ गाँव में ही ऐसा काम करने में अधिकाँश मजदूरों की रुचि नही है। सरकार कहती है कि मनरेगा में 210 दिन काम की गारंटी हम देते हैं। कुछ लोग इनमें मेहनत करते हैं तो कुछ लोग प्रधानों से मिलीभगत करके बिना काम के भी पैसा बना लेते हैं।

    सरकार इसके साथ में मुफ्त या सस्ता राशन, पेंशन, शौचालय व प्रधान मंत्री आवास योजना, मुफ्त उज्ज्वला योजना में गैस, अत्यन्त सस्ती मात्र एक रुपये में चिकित्सा सेवा, आयुष्मान योजना, मातृत्व लाभ, दुर्घटना बीमा, आँगनबाड़ी योजनाएं और सड़क, बिजली, पानी आदि भी गाँव में उपलब्ध कराती है।

    अब सवाल उठता है कि फिर भी ये मजदूर इतना दूर दराज के शहरों में क्यों भटकते रहते हैं ? जहाँ नियमित और सन्तोषजनक कमाई के बावजूद उनके पास एक- दो महीने तक बैठकर खाने या अचानक वापसी की स्थिति में किराये भाडे की व्यवस्था भी नही हो पाती । जबकि वहाँ भी स्थानीय सरकारें उनको अनेक कल्याणकारी सुविधायें देने का दावा करती रहती हैं।

    सोचना ही पड़ता है भैया जी कि कहीं मजदूरों की मजबूरी का ये अधूरा सच तो नही है। बकौल इनके जब शहर में उन्हें इतनी भी सुविधा नहीं है, जो गाँव की बराबरी कर सके तो वे इस तरह थोक में क्यों पलायन करते हैं?

    मैं भी ग्रामीण क्षेत्र में ही रह रहा हूँ। बिना ऐसी सरकारी सुविधाओं के जो कि मजदूरों को बड़ी आसानी से मिलती हैं। अपनी सीमित आमदनी में ही सारे खर्चे चलाता हूँ । जबकि मैने इस महीने भी देखा कि कुछ तथाकथित गरीब कोटे से मुफ्त राशन लेकर किराने की दुकान पर बेच आये। और उस पैसे से दुगने दाम की दारु, मुर्गा, मीट या तिगुने दाम का गुटखा, तम्बाकू आदि वस्तुएं खरीदा।

    मैं सीधी- सीधी सच्ची बात बोलूं भैया जी, दरअसल आपको बाहर दूर दराज जाकर रोजगार की कम, अपनी सोच बदलने की ज्यादा जरुरत है। प्रवासी मजदूरों में एक बड़ा प्रतिशत अशिक्षित किशोरों और युवाओं का है जिनके दिमाग में ऐसी भौतिक व गैर जरुरी वस्तुओं के प्रति बड़ा आकर्षण पलायन का एक महत्वपूर्ण कारण है।

    अनेक लोगों से हुई बातचीत से मुझे लगता है कि इसके पीछे कहीं न कहीं शहरी चमक दमक और रहन सहन उनके दिमाग पर ज्यादा हावी होता है, बनिस्बत गाँव की सीधी साधी प्रदूषण मुक्त जिन्दगी के।

    जींस की फटी हुई पैंट, पचास रुपये वाला चमकदार धूप का चश्मा, पाँच सौ या हजार रुपये में खरीदा गया सेकेंड हैंड स्मार्ट फोन, मॉल की चकाचौंध, सिनेमा संस्कृति, देशी के बजाय अन्ग्रेजी दारु वाली उन्मुक्त जिन्दगी यहाँ खासकर युवाओं को विशेष रूप से लुभाती है।

    भले ही उन्हें गाँव के कच्चे मकान से भी बदतर लकड़ी या जंग लगे टीन से घेरी गयी जुग्गी या पोलीथिन से ढंकी नाले किनारे की झोपड़ी में ही क्यों न रहना पड़े। लैट्रीन या बाथरुम के लिये घंटों लाईन क्यों न लगाना पड़े । शहर से वो गाँव में एड्स, कैन्सर या कोरोना जैसी बीमारी ही क्यों न लेकर आ रहे हों। पर शहर का यही मोह उन्हें ज्यादा खींचता है।

    माना कि कहीं – कहीं गाँव में अनेक दुश्वारियां व कुछ सामन्ती टाईप की दबंगई भी होगी, राजनीति भी हावी होगी किन्तु सबका निदान भी होता है। गाँव में अन्य सुविधाओं के साथ में बच्चों के लिये मुफ्त शिक्षा, मुफ्त किताबें, बस्ता, स्कूल ड्रेस, दोपहर का भोजन की सरकारी सुविधा के बावजूद यदि वो मजदूर परिवार प्राथमिक शिक्षा भी नही ग्रहण करना चाहते, तो गँवार शहरी बनकर भी न तो अपना और न ही अपनी आने वाली पीढी का ही कोई भला कर पायेंगे ।
    सच्चाई यही है कि शहर पढ़े लिखे सुयोग्य लोगों या किसी काम में दक्षता प्राप्त लोगों को ही आसानी से समायोजित कर सकता है, सभी को नहीँ । यदि शिक्षा पाकर, कोई विशेषज्ञता हासिल कर वहाँ जाया जाय तो जरुर वहाँ अच्छा पैसा व जिन्दगी पायी जा सकती है, अन्यथा पलायन करके किसी का दयापात्र या वोट बैंक बने रहने की खोखली जिन्दगी जीने का , बार- बार लाचार की मौत मरते रहने का कोई फायदा नहीं।

    इसलिये बेहतर होगा अपने घर में ही रहो। अब तो राज्य व केंद्र सरकारों ने मजदूरों के लिये रोजगार पर अतिरिक्त ध्यान देना शुरु कर दिया। अत:पहले यथा सम्भव गाँव में ही शिक्षित होइये, फिर मजबूत बनिये । कभी- कभी जाकर शहर का पर्यटन भी कर आना, लेकिन पलायन नही करना। वर्ना कहने सुनने को अधिक कुछ भी नही बचेगा । थोड़ा लिखा, बहुत समझना। बाकी आप की मर्जी। – अरविन्द कुमार ‘साहू’

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