दिल्ली– दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सरकार 6-8 जून तक दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर चर्चा करेगी। प्रस्ताव पास करके केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। मगर इससे पहले दिल्ली विधानसभा 5 बार और मेट्रोपोलिटन काउंसिल दो बार पूर्णराज्य का दर्जा दिए जाने की मांग का प्रस्ताव सदन में पास करके केंद्र को भेज चुके हैं लेकिन अंतिम फैसला केंद्र सरकार को लेना है, जहां से अभी तक मुहर नहीं लग पाई। आम आदमी पार्टी ने 2013 और 2015 के चुनावी घोषणापत्र में दिल्ली को पूर्णराज्य का दर्जा दिलाने का वादा किया था, पर दो साल पहले आप सरकार द स्टेट ऑफ दिल्ली बिल, 2016 जारी करके जनता की राय मांगने से आगे नहीं बढ़ पाई।
आप सरकार ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का जो ड्राफ्ट बिल तैयार करके जनता के लिए जारी किया था, उसमें साफ था कि दिल्ली में उपराज्यपाल की जगह संविधान के अनुच्छेद 163 में तय राज्यपाल होगा जो चुनी हुई सरकार की सलाह पर काम करेगा। फिर एनसीटी दिल्ली एक्ट, 1991 खत्म हो जाएगा। हालांकि, एनडीएमसी इलाके को इस दायरे से बाहर रखकर विशेष दर्जा दिया जाएगा। साथ में एमसीडी एक्ट, 1997, दिल्ली पुलिस एक्ट, 1978 में संशोधन के साथ-साथ दिल्ली की अपनी पुलिस, सिविल सर्विसेज और वन सेवा होगी।
भाजपा शासित दिल्ली सरकार ने 1993 में दिल्ली को पूर्णराज्य का दर्जा देने के लिए दिल्ली विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया था। शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली राज्य की कांग्रेस सरकार ने भी दो बार विधानसभा में ऐसा प्रस्ताव पारित किया था। शीला दीक्षित ने कहा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का प्रस्ताव विधानसभा में पास करके भेज सकते हैं। लेकिन अंतिम फैसला तो केंद्र को ही लेना है। एक प्रस्ताव मेरे कार्यकाल में भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने का पास करके भेजा था लेकिन केंद्र में भाजपा की सरकार थी जो अंतिम रूप नहीं दे पाई।







