अंशुमान खरे
इस समय दान देने वालों की बाढ़ सी आ गई है। जिसे देखो वही दो केले लेकर कैमरों के बीच दान कर रहा है। दो केले देकर बीसों लोग फोटोशूट करा रहे हैं। भागमभाग में ये दानवीर फोटोशूट कराकर अखबारों मे समाचार छपवाने को बेताब हैं। इनके दान को देखकर दानवीर कर्ण भी भौचक्का हैं। जिसे देखो वही लकालक कुर्ता पाजामा पहनकर दानवीर का फर्ज अदा करने कैमरों के साथ साथ भागमभाग कर रहा था। दो केलों के साथ सैकड़ो लोगों ने फोटोशूट कराया। बेचारा गरीब कुछ समझ भी नहीं पा रहा। ये लोग दानवीर कहलाने के लिए मारा मारी कर रहे हैं।
दानवीरो का काफिला अपना अपना चेहरा फोटो मे दिखाने के लिए मार पीट पर उतारू है। दद्दा ऐसे मौकों पर कहां चूकते हैं। दानवीरों में धक्का मुक्की करके जगह बना ली। सौ आदमी और दान के लिए केले दो। पहले पता होता इतने वजनी हैं तो क्रेन वगैरह की व्यवस्था कर लेते। बड़ी नाइन्साफ़ी है, केले दो और बांटने वाले सौ से ज्यादा। और तो और फोटो खिचाने के चक्कर मे हाथापाई की नौबत। कपड़े तक तार तार हो गए।
नहा – धोकर सब दानवीरों की लाइन में लग गए। कब फोटोशूट हो सबको इसी का इंतजार था। भूखा प्यासा गरीब आदमी ललचाई नजरों से इंतजार करता रह गया। लोग बाग उसके आगे पीछे घूम घूमकर फोटो खिंचवाने लगे। बेचारा गरीब आदमी खाने के लिए केले को ललचाई नजरों से बस देखता रह गया। दानवीर फोटोशूट के बाद सबके सब गायब। कहीं और जाकर फोटोशूट कराएंगे। गरीब आदमी भूखा प्यासा आधुनिक दानवीरों को बस निहारता रह गया।
दद्दा ऐसे मौकों पर घर से हमेशा खाली पेट निकलते हैं। ऐसे मौकों पर खाने पीने की कोई कमी नहीं रहती है। भूखे भजन न होय गोपाला की तर्ज पर सारे दानवीर पहले स्वयं पेट पूजा करते हैं, जिसमें छीना झपटी, मारपीट सब करम हो जाते हैं। फिर संतुष्टि की डकार लेकर गरीबों के बारे में सोचते हैं। घर परिवार के लिए सभी के सभी खाने के पैकेट पहले ही निकालकर रख लेते हैं। घर वाले भी हमेशा की तरह पैकेट का इंतजार करते रहते हैं। घर मे इतने दिनों रोटी नहीं बनती। दद्दा तो पहले ही पैकेट पूरे परिवार के लिए निकालकर घर पहुंचा देते हैं। बाद का क्या भरोसा। साथी संगी भी खुश,घर वाले भी खुश।
छीना झपटी मे खाने का पैकेट भी जमीन मे गिरकर धरती मां को समर्पित हो जाता है। बेचारा गरीब कभी खुद को कभी जमीन पर गिरे पैकेट को देखता है। पुलिस वाले पैकेट न मिलने से नाराज अलग से।खाने के पैकेट पर पहला जन्मदिन सिद्ध अधिकार उन्हीं का। भूख से बिलबिलाते पुलिसकर्मी लाठी का ताण्डव करना शुरू कर देते हैं। कितनों का पिछवाड़ा लालकर दिया ,पर जी नहीं भरा। पकड़ धकड़ भागमभाग मे बेचारे गरीब, मजदूर पुलिस की ज्यादतियों का शिकार हो रहे हैं। सारे के सारे दानवीर ऐसे गायब जैसे गधे के सिरसे सींग।
अब दानवीरों की भौकाल शुरू, कितने लोगों को खाना खिलाया, अखबार मे फोटो देखना। हे भगवान ये दानवीरों के नाम पर कलंक हैं। बीस आदमी दो केले का वजन नहीं ढो पा रहे।लानत है, दो केले और इतने दानवीर। ऐसे दानवीरों को शरम भी नहीं आती। गरीब आदमी को खाना कौन कहे, एक केला भी नसीब नहीं होता है।
दूसरे दिन अखबार दानवीरों के फोटो और समाचारों से पटे पड़े थे। एक किनारे छोटा सा समाचार था,एक गरीब आदमी की भूख से मौत। आश्चर्य इस बात का कि इतने दानवीरों के बाद भी बेचारा कैसे भूखो मर गया। दद्दा नाराज थे कि इतना दान किया गया फिर भी गरीब भूख से कैसे मर सकता है। जरूर उसने ओवर ईटिंग की होगी।







