Interview: छन्नू महाराज की संगीत साधना देश को समर्पित है

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
शास्त्रीय संगीत के प्रख्यात गायक पद्मभूषण छन्नू महाराज पन्द्रह अगस्त को लखनऊ आये थे। स्वतंत्रता दिवस का उत्साहपूर्ण माहौल था, इसी के साथ सावन माह के बाद भादों भी लगने जा रहा था। रिमझिम फुहारों का मौसम था, प्रकृति में हरियाली थी। शास्त्रीय गायक प्रकृति के इस रूप में भी संगीत देखते है। उनका मन गुनगुना उठता है। वर्षा की बूंदों में भी उन्हें संगीत प्रतिध्वनित होता है, मंद शीतल हवाओं में भी संगीत होता है। ऐसे में पंडित छन्नू महाराज से मुलाकात का अवसर मिला।
पन्द्रह अगस्त उनका जन्मदिन भी है। बातचीत में उनकी पुरानी यादें ताजा हो गईं। वह लखनऊ राजभवन में स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल होने आए थे। बात बरसात की चली तो उन्हें कजरी याद आई। सावन और भादों में सर्वत्र हरियाली दिखाई देती है। पहले खूब झूले पड़ते थे। झूले से सम्बंधित खूब लोकगीत लिखे गए। उन्हें झूला झूलते समय गाना शगुन माना जाता था। शास्त्रीय गायकों ने इसे अपने ढंग से गाया। उन्हें बंदिशों में लयबद्ध किया। नागपंचमी, रक्षाबंधन, स्वतंत्रता दिवस पर कजरी की धूम रहती थी। स्वतंत्रता दिवस पर देशभक्ति की कजरी गई जाती थी।
रक्षा बंधन में भाई बहन के स्नेह की कजरी होती थी। नागपंचमी में भक्ति रस की कजरी खूब होती थी। इसके अलावा ननद, भौजाई, पिया, परदेस, आदि के नोकझोक की कजरी होती थी। मान्यता के अनुसार विंध्याचल देवी का प्रादुर्भाव कजरी वाले दिन हुआ था। इसलिए उनके गुणगान की कजरी का भी गायन होता है। विंध्याचल मंदिर परिसर में इस दिन शास्त्रीय संगीत का भव्य कार्यक्रम आयोजित होता है। इसमें विख्यात गायक, तबला वादक, नृत्य कलाकार अपनी भक्तिमय प्रस्तुति देते है।
छन्नू महाराज ने बताया कि प्रख्यात तबला वादक इस दिन विंध्याचल धाम अवश्य जाते थे। छन्नू महाराज स्वयं भी कजरी के किसी न किसी कार्यक्रम में सहभागी होते है। कजरी का शास्त्रीय गायन उन्हें अच्छा लगता है। पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की पत्नी ललित शास्त्री मिर्जापुर की थी। उनकी लिखी कजरी भी खूब चर्चित हुई-
मैय्या झूलें चनन झुलनवा
पवनवा चंवर झुलावे ना,,
कजरी में इस प्रकार न लगना उंसकी पहचान है। 
रिमझिम बरसे सावनवा
पिया घर आये न ननदी,,
या फिर,,,
घेर घेर आई सावन की
बदरिया ना,,,
छन्नू महाराज इसमें भी सिद्ध हस्त है। उनका कजरी गायन अर्ध शास्त्रीय गायन शैली में निबद्ध होता है। बनारस घराने के गायकों ने इस रूप को विकसित करने में विशेष योगदान दिया। प्रख्यात सहियकर भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने भी अनेक कजरी गीत लिखे। यह सभी खूब प्रचलित हुए।
उन्होंने ब्रज और भोजपुरी में कजरी लिखी। काशी और मिर्जापुर के उपशास्त्रीय संगीतकारो इसे खूब समृद्ध किया। बिस्मिल्ला खान शहनाई पर कजरी सुनते थे। सितार, बांसुरी, हारमोनियम पर भी कजरी खूब बजाई जाती है। ठुमरी सम्राट कहना गलत नहीं होगा। इसी के साथ वह उपशास्त्रीय गायन की अन्य विधाओं में सिद्धहस्त है। वह संगीत को घरानों तक सीमित नहीं करना चाहते। वैसे किराना घराना और बनारस गायकी उनके योगदान से समृद्ध हुई है।
उन्होंने कजरी, खयाल, ठुमरी, भजन, दादरा, कजरी, चैती सभी में महारथ हासिल की। उनके शब्द ठुमकते चलते है। उन्होंने ठुमरी की यही विशेषता बताई। शब्द ठुमक कर चलें और भावपक्ष भी प्रभावी बना रहे। छन्नूलाल मिश्र का जन्म उन्नीस साई छत्तीस में आजमगढ़ के हरिहरपुर में हुआ था। उनकी सात पीढ़ी संगीत में रहीं, लेकिन परिवार की आर्थिक ठीक नहीं थी। बचपन अभाव में बीता। प्रारंभिक पाँच वर्ष इन्होंने अपने पिता बद्री प्रसाद मिश्र संगीत की शिक्षा ग्रहण की। इनकी माताजी रामायण की भक्त थीं।
उन्होंने सुंदरकांड कंठस्थ कराया। इससे संगीत और भक्ति दोनों के प्रति लगाव हुआ। उनकी  संगीत साधना हनुमान मत,शिव मत, नारद मत, भरत मत से ओतप्रोत होकर आगे बढ़ी। संगीत को वह मोक्ष का साधन मानते है। उन्हें उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरष्कार, नौशाद पुरस्कार, यश भारती,बिहार संगीत शिरोमणि, पद्म भूषण पुरष्कार से सम्मानित किया जा चुका है। लेकिन इन सबको वह अनाशक्त भाव से देखते है। संगीत उनके लिए साधना है।

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