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    क्या मुख्यमंत्री की सुरक्षा में तैनात अफसर का किसी को रोकना गलत है?

    ShagunBy ShagunApril 29, 2025Updated:April 29, 2025 ब्लॉग No Comments5 Mins Read
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    Post Views: 305
    • खाकी का सार्वजनिक अपमान क्यों
    • हरियाणा में एक नेता ने डीएसपी से माफी मंगवाई और फिर इसका वीडियो भी वायरल कराया
    • पुलिस अधिकारियों को भी मनचाहे तबादले और पोस्टिंग के लालच से उबरना होगा

    ओम माथुर

    किसी नेता को नहीं पहचानने पर सुरक्षा के लिहाज से कोई पुलिस अधिकारी मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में उसे मंच पर जाने से रोक देता है,तो क्या ये अपराध है ? ये सवाल ही आपको गलत लगेगा, क्योंकि जाहिर है कि पुलिस की ड्यूटी ही वहां सीएम की सुरक्षा के लिए लगाई गई है। लेकिन हरियाणा में शायद ये अपराध माना जाता होगा। तभी तो उस डीएसपी को सार्वजनिक रूप से माफी मंगवाकर उसे अपमानित किया गया,जिसने सीएम सिक्योरिटी में अपनी ड्यूटी मुस्तैदी से निभाई थी। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के सिरसा में रविवार को आयोजित एक कार्यक्रम में डीएसपी जितेंद्र राणा ने एक नेता को नहीं पहचान पाने के कारण उन्हें मंच पर जाने से रोक दिया। ये नेताजी उड़ीसा के पूर्व राज्यपाल गणेशीलाल के बेटे एवं हरियाणा भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य मनीष सिंगला थे। उन्हें खुद का रोका जाना इतना अखर गया कि उन्होंने इसे अपनी इज्जत का सवाल बनाकर डीएसपी से माफी मंगवा उन्हें बेइज्जत करा दिया।

    सोशल मीडिया पर राणा के माफी मांगते हुए वीडियो को वायरल भी किया गया। इसे जारी भी पुलिस पीआरओ के माध्यम से कराया गया है। जिसमें सिंगला खुद भी गर्व के साथ बैठे हैं। राणा कह रहे हैं कि वह सीएम के सुरक्षा प्रोटोकॉल में थे। सिंगला जब मंच तक पहुंचे, तो मैंने उन्हें अन्य लोगों के साथ ही वापस जाने को कहा। मैं उन्हें पहचान नहीं सका। मेरा उनके मान-सम्मान को ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था। यदि मेरे कार्य से मनीष सिंगला को ठेस पहुंची हो, तो मैं उनसे माफी मांगता हूं। उनका और उनके परिवार के लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है। इसी वीडियो में फिर सिंगला किसी विजेता की तरह कहते हैं कि वो राणा की क्षमायाचना से संतुष्ट हैं। अब उनसे कोई गिला शिकवा नहीं है। मेरी उनसे पहले मुलाकात नहीं थी। इसलिए शायद वो मुझे पहचानते नहीं थे और इसलिए उन्होंने मुझे रोका था। दरअसल,सिंगला को मंच पर जाने से जब रोका गया था,तो उसका भी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और इसे सिंगला ने अपनी बेइज्जती के तौर पर देखा। फिर जवाब में राणा के माफी मांगने का वीडियो जारी करवाया।

    राणा जींद जिले में तैनात हैं और सीएम की सुरक्षा ड्यूटी में ही रविवार को सिरसा आए थे। जाहिर है वह सिंगला को नहीं पहचानते होंगे और यह बात सिंगला खुद भी कह रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद एक पुलिस अधिकारी से माफी मंगवा उसे अपमानित करना क्या पूरी पुलिस फोर्स का मनोबल गिराना नहीं है? यह जरूरी नहीं है कि हर पुलिस अधिकारी सभी नेताओं को जानता हो। आजकल तो वैसे ही नेताओं की भरमार है। खासतौर पर सत्तारूढ दल से जुड़ा तो हर व्यक्ति खुद को नेता ही समझता है। हर शहर -जिले में से छप्पन सौ साठ ऐसे नेता मिल जाएंगे। फिर सिंगला ना तो अभी हरियाणा में विधायक है। ना सांसद है। ना कोई मंत्री। वह महज एक कारोबारी और भाजपा की कार्यकारिणी के सदस्य हैं। लेकिन उनमें गुरूर किसी बड़े नेता जैसा ही था। सोचिए, हरियाणा में जब एक छोटा सा भाजपा नेता डीएसपी रैंक के पुलिस अफसर को माफी मांगने के लिए मजबूर कर सकता है,तो वहां के विधायकों, मंत्रियों और सांसदों की हैसियत क्या होगी? वो तो एसपी,डीआईजी, आईजी,डीजीपी को भी शायद अपना गुलाम समझते होंगे।

    जिस कार्यक्रम में सिंगला को डीएसपी राणा ने मंच पर जाने से रोका था,वह नशा मुक्त हरियाणा साइक्लोथान के नाम से था। सवाल ये है कि युवाओं को नशा मुक्त करने के लिए प्रयास कर रही भाजपा सरकार क्या अपने ही नेताओं को सत्ता के नशे से कैसे मुक्ति दिलाएगी? हरियाणा ही नहीं हर राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के नेता खुद को पुलिस-कानून से ऊंचा ही समझते हैं। आए दिन ऐसी खबरें आती रहती है जब सांसदों,विधायकों या मंत्रियों के परिजन पुलिस या अधिकारियों से दुर्व्यवहार करते हैं या आम जनता से दादागिरी। अगर पुलिस के साथ इस तरह का बर्ताव होगा, तो उसका मनोबल तो गिरेगा ही। लेकिन क्या ऐसे समय में सिरसा के पुलिस अधीक्षक मयंक गुप्ता को राणा के समर्थन में खड़ा नहीं होना चाहिए था? लेकिन उन्होंने तो खुद बाद में बयान दिया कि राणा ने ड्यूटी के दौरान जो किया,वो गलत नहीं था। लेकिन सिंगला सिरसा के प्रमुख व्यक्तियों में है। इसलिए उन्हें अधिकारी का व्यवहार बुरा लगा। इसलिए राणा ने उनसे माफी मांगी। यानि वो भी मानते है कि राणा गलत नहीं थे। लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण उन्हें माफी मांगनी पड़ी।

    इसमें कोई शक नहीं कि यह पुलिस फोर्स के मनोबल को गिराने वाला कृत्य है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या पुलिस में अब मनोबल, आत्मसम्मान, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा बची है? क्योंकि अधिकांश बड़े पुलिस अधिकारी मनपसंद स्थान और पोस्टिंग के लिए नेताओं के आगे-पीछे घूमते हैं। एक बार किसी नेता ने अगर किसी पुलिस अधिकारी को उपकृत कर दिया, तो वह उसे फिर सत्ता में रहने तक अपना आदमी समझकर उससे अपने सभी उल्टे-सीधे काम करने की उम्मीद भी करता है। तबादलों में खादघ यानी विधायकों और मंत्रियों का सीधा हस्तक्षेप इसे और बढ़ाता है। हर विधायक – मंत्री अपने इलाके में ऐसा एसपी, डीएसपी यानि खाकी चाहता है जो उसके इशारों पर काम करे। कुछ पुलिस अधिकारियों को छोड़ दिया जाए, तो अधिकांश तबादलों, मनचाही पोस्टिंग और राजनीतिज्ञों की सरपरस्ती में रहना महफूज समझते हैं। ऐसे में जनता के बीच भी पुलिस की विश्वसनीयता और छवि नष्ट हुई है। लेकिन इस तरह सार्वजनिक रूप से एक डीएसपी का अपमान किसी भी रूप में स्वीकार नहीं होना चाहिए।

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