महोबा का आल्हा चौक किसने बनवाया था?

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आज हमें संजीव अहलूवालिया बहुत याद आते हैं। न वे महोबा आते और न यहां खूबसूरत आल्हा चौक बनता और न हम अमरवीर आल्हा व उनके पश्यावत हाथी के दर्शन कर पाते। एहलूवालिया जैसा ईमानदार और तेज तर्रार आईएएस अफसर हम महोबा के लोगों ने आज तक नहीं देखा। उनके नाम से थर-थर कांपते थे अपराधी।
दुर्भाग्य की बात यह है कि वे आज कहां हैं और किस पद पर हैं, ये तो कोई नहीं जानता लेकिन वे अमरवीर आल्हा की तरह महोबा के इतिहास में अमर हो गये हैं। अगर वे ये आल्हा चौक न बनवाते तो आज महोबा में आल्हा की कोई निशानी ही न मिलती। सन 1983-84 में जब वे महोबा के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट थे, तब उन्होंने मात्र कुछ हजार रूपये के बजट में आल्हा और उनके विशाल हाथी पश्यावत की अदभुत प्रतिमाएं बनवा डाली।
वे कहते थे कि महोबा आल्हा-ऊदल जैसे जिन वीरों की वजह से वीरभूमि कहलाता है, यहां उनकी कोई निशानी तक नहीं है। छोटे भाई ऊदल भर की एक प्रतिमा नगर में लगी है, बड़े भाई आल्हा को सबने भुला दिया। युधिष्ठिर के अवतार आल्हा का स्मारक हम बनवाएंगे। चंदेल सेनापति दस्सराज व देवला के वीर सपूत आल्हा की कोई तस्वीर उपलब्ध न थी। तब अहलूवालिया साहब ने महोबा के ऐतिहासिक कजली मेले में आल्हा बनकर हाथी पर निकलने वाले राजाराम पाल को देखकर आल्हा और हाथी का निर्माण करवाया। जून, 1984 में ये आल्हा चौक बनकर तैयार हुआ। राजा परमाल के जिस प्रधान सेनापति आल्हा ने 1182 में अपने गुरू गोरखनाथ के कहने पर युद्ध में परास्त हो चुके दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान को प्राणदान दे दिया था, आज उनके स्मारक की हालत भी खराब है। सड़कों की ऊंचाई बहुत ज्यादा बढ़ जाने के कारण स्मारक की ऊंचाई बहुत कम हो गयी है।
अब महोबा को फिर कोई एहलूवालिया चाहिए जो नगर की ऐतिहासिक विरासतों के बारे में सोचे। मान्यता है कि आल्हा सिर्फ कजली के मेले में महोबा आते हैं। वो भी बारिश लेकर। कजली मेले में बारिश हुई, समझो आल्हा आ गये। बाकी समय वे यहां नहीं रुकते, वे मैहर की शारदा माई के दरबार में रहते हैं। इस बात का प्रमाण है वहां रोज सुबह माई के चरणों में सबसे पहले आल्हा का फूल चढ़ाना। चंदेल वंश की यश कीर्ति चारों दिशाओं में फैलाने वाले आल्हा-ऊदल को जब मामा माहिल के कहने पर राजा परमाल ने देश निकाला दे दिया तो फिर पृथ्वीराज चौहान के हमले से मातृभूमि को बचाने के लिए तो आल्हा भाई ऊदल के साथ महोबा जरूर आये लेकिन दिल्ली नरेश को प्राण दान देकर आल्हा ने न केवल संन्यास ले लिया था बल्कि वे गुरू गोरखनाथ जी के साथ यहां से चले गये थे। उनका दिल यहां के लोगों से कट गया था।
– वरिष्ठ पत्रकार तारा पाटकर की वॉल से

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