खरी खरी – अजीत कुमार सिंह
सरकारी महकमा अवधारणा नैरेटिव और हकीकत…..हमारी पीढ़ी के बहुत से लोग प्राइमरी पाठशाला में ही पढ़े होंगे हां कुछ नया वर्ग कानवेंट आदि में भी पढ़ा होगा। आपने सोशल मीडिया पर कभी कभार एक दुष्प्रचार या हकीकत जो भी कहिए अक्सर देखा होगा प्राइमरी के शिक्षकों को अधिकारी हड़का रहा है कोई ईमला बोलकर लिखवा रहा है कोई अंग्रेजी में ट्रांसलेशन करवा रहे हैं हो सकता है कुछ अयोग्य लोग हों लेकिन बहुतायत में ऐसा नहीं है लोकतंत्र में शिक्षा मंत्री अनपढ़ हो सकता है पर शिक्षक एक प्रकिया के तहत भर्ती होता है वो योग्य है इसमें कोई शक नहीं है हां यह नैरेटिव धीरे धीरे सेट किया जा रहा है कि प्राथमिक सरकारी शिक्षा व्यवस्था में लगे लोग मक्कार होते हैं ।
आपको विकल्प के रूप मे प्राइवेट का रुख करना है और प्रचार तंत्र के आधीन जन मानस ऐसा ही कर रहा है पर अतीत को याद कीजिए तो उन्हीं प्राथमिक विद्यालय के गुरुजी लोग डंडा से ठोक ठोक के कक्षा 5 तक के बच्चों को 20 तक का पहाड़ा याद करा दिया करते थे गणित के कठिन सवाल हल करना सिखा देते थे गांव और कस्बों से पढ़े लोग कक्षा 10 तक ट्यूशन जानते ही नहीं थे कोचिंग जानते ही नहीं थे अब कान्वेंटी व्यवस्था में कक्षा एक, दो से ही कोचिंग ट्यूशन वाली महामारी चालू हो जाती है कौन अच्छा था कौन बुरा इसका आकलन खुद करिए।
गुरु शिष्य कि वह परंपरा थी कि आज हम लोग लगभग अधेड़ उम्र में पहुंच चुके हैं आज भी हमारे प्राइमरी के शिक्षक कक्षा हाई स्कूल इंटर वाले गुरुजी अगर शादी विवाह किसी फंक्शन में आज भी गांव घर में मिल जाते हैं तो हम लोग दंडवत हो जाते हैं यह सब ऐसे नही होता ये परंपरा उन्होंने भी निभाई आज सीबीएससी की चमक दमक के आगे परिषदी स्कूल राज्यों के बोर्ड के स्कूल सब अधोगति को प्राप्त कर रहें हैं अब बारी है स्नातक के ऊपर की शिक्षा का उसका भी निजीकरण हो रहा है इसीलिए अपने जमाने में शीर्ष पर रहे बहुत सारे सरकारी विश्वविद्यालयों में तमाम राजनीतिक प्रपंच छेड़छाड़ के उनकी व्यवस्थाओं को उनकी छवि को धूमिल किया जा रहा है चौपट किया जा रहा है ,बैंकिंग सेक्टर में आपने देखा होगा स्टेट बैंक के कर्मियों के मक्कारी के आप रोज चुटकुले पढ़ते होंगे जैसे अन्य पर चुटकुले लोग पढ़ते रहे कि लंच टाइम है ताश खेल रहे हैं रमी खेल रहे हैं आपको सेवाएं नहीं मिल रही है पर आज भी उसका हर प्रकार का लोन और बैंकों से सस्ता है अगर आपका खाता प्राइवेट बैंक में है तो आप देखेंगे कि उल जलूल सेवाओं के नाम पर आपका जमा धन कुछ न कुछ काटते रहेंगे लेकिन आपको चुटकुले बाजी उन्ही बैंकिंग सेक्टर के खिलाफ मिलेगी जो सरकारी अधीनस्थ हैं कारण कि उनको अयोग्य घोषित करके प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा देना है।
स्वास्थ्य सेवाओं का बेतहाशा निजी करण छोटे-छोटे क्लीनिक खोले बैठे डॉक्टर मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल के नाम पर धन संग्रह केंद्रों के रूप में खुले अस्पताल आप को खोखला कर के पूरा चूस के आखिर में आपको आखिर में भेजते सरकारी संस्थान केजीएमयू पीजीआई और AIIMS मे ही है अंतिम सहारा वही है….
सरकारी सेवा में चयनित कोई भी पेशेवर हो शिक्षक हो डॉक्टर हो इंजीनियर हो कोई अधिकारी हो प्रशासनिक अधिकारी हो उसकी एक कठिन चयन प्रक्रिया है कुछ कार्य नियमावली होती है जवाबदेही भी होती है।
लोकतंत्र में चुनाव छोटा हो या बड़ा इसी सरकारी कर्मी पर ही भरोसा किया जाता है कोई बड़ी आपदा हो आग भूकंप जल प्रलय कोरोनावायरस जैसी आपदा से यही प्रशासनिक अमला लड़ता है लोगों को तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराता है वह उतना अयोग्य नहीं है वह उतना गैर जिम्मेदार नहीं है जितना आपको बताया जा रहा है यह निजीकरण की एक आसन्न कवायद है जो दुष्प्रचार तंत्र ने छेड़ रखी है।







