ठहर गये
जुड़ने के क्षणों में
हम बिखर गये
यात्री सभी
यात्रा पर हैं
और बन गये
यहां हम
मील का पत्थर हैं
ढूंढने हमें
लोग किधर गये
शून्य हो गया शरीर
महसूसने लगे हैं
अपना ही
अस्तित्व
लीलने लगे हैं
जिस बर्तन में डालो
हम भर गये
झूठ सरेआम
सच को नचा रहा है
अच्छाई का
तमाशा
फरेब दिखा रहा है
यह सब देख
हम ठहर गये
- आनंद अभिषेक







