कम लागत में गेंदा की खेती कर कमाएं ज्यादा मुनाफा

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घरों की सजावट हो या मंदिरों की पूजन का समय, हर जगह गेंदा के फूल की मांग रहती है। यही नहीं गेंदा का फूल औषधीय गुणों से भी भरपुर होता है। कान में दर्द होने पर आज भी गांवों में इसकी पत्तियों के रस का प्रयोग होता है। अपरस की बीमारी या अंदरूनी चोट में भी इसकी पत्तियां काम आती है। कम लागत में गेंदा के फूल से किसान अच्छी आमदनी कर सकते हैं। गेंदा तीनों मौसम में लगाया जाता है। रबी के मौसम के गेंदा के रोपाई का अंतिम समय चल रहा है।

इस संबंध में उप निदेशक उद्यान अनीस श्रीवास्तव का कहना है कि यह कम लागत में अच्छी आमदनी देने वाली खेती है। इसमें यदि किसान के पास अपना खेत है तो दो से तीन हजार रुपये प्रति बिघा अधिकतम खर्च है। वहीं पैदावार 30 से चालीस कुंतल प्रति बिघा हो जाती है। सीजन में यह भी फुल 100 रुपये किलो आसानी से बिक जाता है। इस तरह इससे प्रति बिघा दो लाख रुपये से अधिक हो जाती है। उत्तर भारत में मैदानी क्षेत्रो में शरद ऋतु में उगाया जाता है तथा उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में गर्मियों में इसकी खेती की जाती है। गेंदा की खेती बलुई दोमट भूमि उचित जल निकास वाली उत्तम मानी जाती है।

गेंदा की उन्नतिशील किस्में:

प्रमुख रूप से गेंदा के चार प्रकार हैं। प्रथम अफ्रीकन गेंदा जैसे कि क्लाइमेक्स, कोलेरेट, जॉइंट सनसेट,क्राउन आफ गोल्ड, क्यूपीट येलो, मैमोथ मम, फर्स्ट लेडी, फुल्की फ्रू फर्स्ट, जुबली, इंडियन चीफ ग्लाइटर्स, मन इन द मून, रिवर साइड ब्यूटी, येलो सुप्रीम, स्पन गोल्ड आदि है। ये सभी व्यापारिक स्तर पर कटे फूलो के लिए उगाई जाती है। दूसरे प्रकार की मैक्सन गेंदा जैसे कि टेगेट्स ल्यूसीडा, टेगेट्स लेमोनी, टेगेट्स मैन्यूटा आदि है। ये सभी प्रमुख प्रजातियां है। तीसरे प्रकार की फ्रेंच गेंदा जैसे कि बोलेरो गोल्डी, गोल्डी स्ट्रिप्ट, गोल्डन ऑरेंज, गोल्डन जेम, रेड कोट, डेनटी मैरिएटा, रेड हेड, गोल्डन बाल आदि है। इन प्रजातियों का पौधा फ़ैलाने वाला झड़ी नुमा होता है। पौधे छोटे होते है देखने में अच्छे लगते है। चौथे संकर किस्म की प्रजातिया जैसे की नगेटरेटा, सौफरेड, पूसा नारंगी गेंदा, पूसा बसन्ती गेंदा आदि हैं।

समतल क्यारियों में करें रोपाई:

गेंदा के पौधों की रोपाई समतल क्यारियों में की जाती है। रोपाई की दूरी उगाई जाने वाली किस्मों पर निर्भर करती है। अफ्रीकन गेंदे के पौधों की रोपाई में 61 सेंटीमीटर लाइन से लाइन तथा 46 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी रखते है तथा अन्य किस्मों की रोपाई में 40 सेंटीमीटर पौधे से पौधे तथा लाइन से लाइन की दूरी रखते है।

खाद का करें प्रयोग:

300 से 350 कुंतल सड़ी गोबर की खाद खेत की तैयारी करते समय प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देना चाहिए। इसके साथ ही अच्छी फसल के लिए 125 किलोग्राम नत्रजन, 85 किलोग्राम फास्फोरस तथा 80 किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा खेत की तैयारी करते समय अच्छी तरह जुताई करके मिला देना चाहिए।

रोग और निदान:

अनीस श्रीवास्तव ने बताया कि गेंदा में खर्रा रोग, अर्ध पतन, विषाणु रोग तथा मृदु गलन रोग लगते है। अर्ध पतन हेतु नियंत्रण के लिए रैडोमिल 2.5 ग्राम या कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम या केप्टान 3 ग्राम या थीरम 3 ग्राम से बीज को उपचारित करके बुवाई करनी चाहिए। खर्रा रोग के नियंत्रण के लिए किसी भी फफूंदी नाशक को 800 से 1000 लीटर पानी में मिलाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए। विषाणु एवं गलन रोग के नियंत्रण हेतु मिथायल ओ डिमेटान 2 मिलीलीटर या डाई मिथोएट एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। उन्होंने बताया कि गेंदा में कलिका भेदक, थ्रिप्स एवं पर्ण फुदका कीट लगते है। इनके नियंत्रण हेतु फास्फोमिडान या डाइमेथोएट 0.05 प्रतिशत के घोल का छिड़काव 10 से 15 दिन के अंतराल पर दो-तीन छिड़काव करना चाहिए अथवा क़यूनालफॉस 0.07 प्रतिशत का छिड़काव आवश्यकतानुसार करना चाहिए।

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