वरिष्ठ आईपीएस ऑफिसर अमिताभ ठाकुर ने आज अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर दो समसामयिक कवितायेँ पोस्ट की है जो मौजूदा समय के हिसाब से फिट बैठती हैं आप भी जरूर पढ़ें एक बार…
आज तो हाथ खोल रहे हो…
आज तो हाथ खोल रहे हो,
वाह-वाह, वाह-वाह बोल रहे हो,
कल इसमें छिपे हैं खतरें,
कुछ तो अभी ही दिखने लगे हैं।
बमुश्किल खेल ये बंद हुआ था,
यहाँ वहां जब जेल हुआ था,
दे बन्दर के हाथ उस्तरा,
बढ़ा दिया सब के गले का खतरा।
अमिताभ ठाकुर
तुमने कितने मारे..
तुमने कितने मारे,
तुमने कितने मारे,
इतने कम क्यों मारे,
बस इतने ही मारे?
अमिताभ ठाकुर








