ठंड के दोहे
चादर छाई धुंध की, धूप हुई निस्तेज।
दिन चितकबरा कर रही, ठंड अजब रंगरेज।।
चलो सहेली बर्फ में खोजें उसका रूप।
अलसायी सी चाँदनी, या धुंधलाई धूप ।।
माघ जगाये धूप को, धूप जगाये फाग ।
फाग जगाये रूपसी, गाये पाहुन राग ।।
मदमाई ठंडी हवा, खड़ी भरे तूणीर।
साँय- साँय कर बेधती, सन्नाटे में तीर।।
ठंड कँटीली हो गयी ,मादक-मादक रात,
पाहुन बसे विदेश में, प्यासे -प्यासे गात। – अरविंद कुमार साहू







