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माघ मास का जितना हमारे जीवन में आयुर्वेदिक महत्व है, उतना ही धार्मिक भी। श्रीरामचरितमानस, पद्मपुराण, मत्स्यपुराण, महाभारत और निर्णय सिंधु आदि ग्रंथों में इस महीने की महिमा का वर्णन है। इस महीने में किए गए स्नान, दान, तप और तीर्थराज प्रयाग में कल्पवास को अनेक यज्ञों के समान माना गया है।
प्रयाग में संगम में डुबकी लगाने के लिए देशभर से श्रद्धालु एकत्र होते हैं। ये श्रद्धालु एक महीने तक कल्पवास करते हैं, जिसे आम भाषा में माघ मेला कहा जाता है। संगम के किनारे मेला क्षेत्र में पूरा शहर बस जाता है। माना जाता है कि माघ में 33 करोड़ देवी-देवता तीर्थराज प्रयाग आते हैं।
सनातनधर्मी उनका आशीर्वाद लेने यहां एकत्र होते हैं। कल्पवासी एक महीने तक कठिन नियमों और व्रतों का पालन करते हैं। उनका दिन ब्रह्ममुहूर्त से आरंभ हो जाता है। संगम में स्नान के बाद वे ध्यान, पूजा-पाठ और दान करते हैं। कई कल्पवासी एक समय ही भोजन करते हैं।
कल्पवास का अर्थ है काया का शोधन:
कहा जाता है कि प्रयागराज में एक महीने का कल्पवास करने से अनेक अश्वमेध यज्ञों के समान फल मिलता है। कल्पवास का अर्थ है काया का शोधन, लेकिन यहां काया शोधन के साथ- साथ मन और आत्मा का शोधन भी किया जाता है। भारत और ब्रिटेन के मनोवैज्ञानिकों ने 1,000 कल्पवासियों पर शोध किया और पाया कि उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमता में सकारात्मक परिवर्तन हुए।
रोगों से मुक्ति:
शारीरिक क्षमता बढ़ी और रोगों से मुक्ति मिली। कल्पवास पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक रहता है। कहा जाता है कि जो नियमपूर्वक उत्तम व्रत का पालन करते हुए माघ मास में प्रयागराज में स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग को जाता है। माघ महीने के हर दिन को पर्व माना गया है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का शकट चतुर्थी व्रत होता है, जिसे तिलकुटा चतुर्थी भी कहते हैं।
तिलकुट का महत्त्व:
तिल और गुड़ से तिलकुट बनाया जाता है जिसका गणेश को भोग लगाने के साथ-साथ स्वयं भी सेवन किया जाता है। आयुर्वेद में तो यह भी कहा गया है कि इस महीने में तिल को अपने भोजन का अनिवार्य हिस्सा बनाएं। रोटी बनाते समय आटे और खिचड़ी में तिल डालें। इससे सालभर का कैल्शियम शरीर में एकत्र हो जाता है।