मकोका की तर्ज पर यूपीकोका का विधेयक उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश -विरोध में विपक्ष हुआ एकजुट

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लखनऊ । उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने सूबे में गैंगस्टर, माफियाओं और संगठित अपराध पर नकेल कसने के लिए बुधवार को विधानसभा में ‘उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक 2017’ पेश किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सदन में इस विधेयक पेश किया। अब कल इस पर चर्चा होगी और सत्तापक्ष इसे पारित करायेगा। इस बीच इस विधेयक को लेकर विपक्ष लामबंद होने लगा है।
विदित हो कि उप्र विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होने से ठीक पहले ही योगी मंत्रिमण्डल ने इस विधेयक के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। यूपीकोका के विधेयक का प्रारूप महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून-1999 (मकोका) का गहन अध्ययन करके तैयार किया गया है। इस कानून को लागू करने के पीछे योगी सरकार की मंषा प्रदेश में गुंडागर्दी, माफियागिरी और समाज में अशांति फैलाने वाले तत्वों को चिह्नित कर उनके खिलाफ विशेष अभियान के तहत कठोर कार्रवाई करने की है। इस विधेयक को उच्च न्यायालय में संगठित अपराधियों, माफियाओं और अन्य सफेदपोश अपराधियों की गतिविधियों पर नियंत्रण के सम्बन्ध में दायर याचिका पर 12 जुलाई 2006 को पारित आदेश के क्रम में माफियाओं की गतिविधियों तथा राज्य सरकार के कार्यों में हस्तक्षेप पर अंकुश लगाने के लिये कानून का प्रारूप न्याय विभाग की सहमति से तैयार किया गया है। विधेयक के परीक्षण के लिये गृह विभाग के सचिव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी थी। इसमें अपर पुलिस महानिदेशक (अपराध) तथा विशेष सचिव (न्याय विभाग) को भी शामिल किया गया था। इस विधेयक में 28 ऐसे प्रावधान हैं जो पहले से लागू गैंगस्टर एक्ट में शामिल नहीं हैं। प्रस्तावित कानून के तहत दर्ज मुकदमों की सुनवाई के लिये विशेष अदालतें बनेंगी। वहीं पूरे प्रदेश में संगठित अपराध करने वाले गिरोहों पर नियंत्रण एवं उनकी गतिविधियों की निगरानी के लिये गृह विभाग के प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में ‘राज्य स्तरीय संगठित अपराध नियंत्रण प्राधिकरण’ के गठन का प्रावधान भी किया गया है। यह प्राधिकरण स्वतः संज्ञान लेकर अथवा शिकायत होने पर संगठित अपराधियों की गतिविधियों की छानबीन करेगा तथा इसके लिये प्राधिकरण शासन की कोई भी फाइल देखने के लिये अधिकृत होगा।
इस अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत होने वाले अभियोग मंडलायुक्त तथा परिक्षेत्रीय पुलिस पर महानिरीक्षक की दो सदस्यीय समिति के अनुमोदन के बाद ही पंजीकृत किया जाएगा। अब तक पुलिस पहले अपराधी को पकड़कर कोर्ट में पेश करती थी, फिर सबूत जुटाती थी। लेकिन यूपीकोका के तहत पुलिस पहले अपराधियों के खिलाफ सबूत जुटाएगी और फिर उसी के आधार पर उनकी गिरफ्तारी होगी। यानी कि अब अपराधी को कोर्ट में अपनी बेगुनाही साबित करनी होगी। इसके अलावा सरकार के खिलाफ होने वाले हिंसक प्रदर्शनों को भी इसमें शामिल किया गया है। इस बिल में गवाहों की सुरक्षा का खास ख्याल रखा गया है। यूपीकोका के तहत आरोपी ये नहीं जान सकेगा कि किसने उसके खिलाफ गवाही दी है।
विधानसभा में प्रस्तुत विधेयक में संगठित अपराध को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि किसी व्यक्ति द्वारा अकेले या संयुक्त रूप से, या तो संगठित अपराध सिंडीकेट के सदस्य के रूप में या किसी ऐसी सिंडीकेट के लिए हिंसा करके या अन्य तरीकों से अवैध क्रियाकलाप को जारी रखना तथा बगावत को बढ़ावा देना भी शामिल है। इसके अलावा आतंक फैलान या बल पूर्वक या हिंसा के जरिए सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए विस्फोटकों या शस्त्रों आदि का प्रयोग कर जीवन या सम्पत्ति को नष्ट करना या राष्ट्रविरोधी या विध्वंसात्मक गतिविधियों में लिप्त होना या सरकार या अन्य लोक प्राधिकारी को मौत या बर्बाद करने की धमकी देकर फिरौती के लिए बाध्य करना भी अब इस कानून के तहत आयेगा। इस कानून के तहत अब उन पर भी कार्रवाई की जा सकेगी जो नकली दवा व अवैध शराब बनाते व बेचते हैं। मानव तस्करी, अवैध वसूली, भाड़े पर हत्या करते या करवाते हैं। सरकारी अथवा निजी जमीनों पर बलपूर्वक या जाली दस्तावेजों के दम पर कब्जा करते हैं।
विधेयक में कहा गया है कि अब यदि किसी की हत्या होती है अपराधी को मृत्यु दण्ड या आजीवन कारावास की सजा के साथ ही 25 लाख रूपए का न्यूनतम अर्थदण्ड लगाया जायेगा। अन्य अपराधों में न्यूनतम सात साल की कैद से आजीवन कारावास तक की सजा के साथ उस पर 15 लाख का अर्थदण्ड भी लगेगा। वहीं अवैध कब्जे अथवा जबरन कब्जा करने के मामलों में न्यूनतम तीन वर्ष से आजीवन कारावास तक हो सकता है। साथ ही पांच लाख का न्यूनतम अर्थदण्ड भी देना होगा।
उधर, ‘उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक 2017’ यानि यूपीकोका को लेकर विपक्ष एकजुट हो चला है। विपक्षी दलों समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस ने इस विधेयक का पुरजोर विरोध करने का ऐलान कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि सरकार यह काला कानून लाने जा रही है। इसका इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों को कुचलने के साथ ही दलितों, पिछड़े वर्गों व अल्पसंख्यकों पर इसका नाजायज प्रयोग किया जायेगा। चूंकि विधानसभा में भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ प्रचण्ड बहुमत में है ऐसे में माना जा रहा है कि वह इस सदन में तो इस बिल को पास कराने में कामयाब रहेगी लेकिन उच्च सदन यानि विधान परिषद में भाजपा अल्पमत में है। वहां जाकर यह बिल अटक सकता है। जिसके बाद भाजपा सरकार के पास अध्यादेष लाने के अलावा कोई और दूसरा रास्ता शेष नहीं बचेगा।

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