नौकरी छूट गयी और आज बेटी भी छूट गयी…

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…. एक बेटी की मौत

नये साल का पहला दिन ज़िन्दगी की हकीकत से रूबरू करवा गया

चलिये जिन्दगी का ख़ास हिस्सा बन चुके सोशल मीडिया से बात शुरु करते हैं। साल का पहला दिन पिछले सालों की हिक़ारत और ज़लालत जैसा ही था। एक जनवरी 2018 के दरवाजे पर उम्मीदों की लाइन लगाये जो चेहरे फेसबुक पर दिखे उनमें से ज्यादातर शक्लें हिक़ारत और ज़लालत की हरकतों से बदशक्ल दिख रहीं थी। हांलाकि दिनभर धक्के खाने के बाद भी उनके चेहरे पर इत्मीनान था। इत्मीनान इस बात का कि वो लाख जद्दोजहद और बेरुखी सहने के बाद भी सत्ताधारियों के साथ फोटों खिंचवाने में कामयाब हो गये थे। आज का बहाना था नये साल की बधाई का। एक जनवरी की वही वाली बधाई जो कल सपा- बसपा या किसी अन्य पार्टी के सत्तानशीनों को देते थे। भाजपा जब सत्ता में नहीं थी तब इस पार्टी के नेता मंगलकामनाओं के लायक नहीं थे। आज जब सपा- बसपा सत्ता में नहीं है तो इन दलों के नेताओं को नये साल की मुबारकबाद देने का सीजन नहीं है।

खैर मैने फेसबुक पर अपने जान-पहचान वालों की खूब तस्वीरें देखीं। सत्ताधारियों को मुबारकबाद देने और फूल देने की तस्वीरें बहुत कुछ बयां कर रही थीं। फूल मैने भी दिये लेकिन मैं किसी मंत्री/गर्वनर या अधिकारी को फूल नहीं दे पाया। मैंने आज साल के पहले दिन एक गरीब मीडिया कर्मी नदीम जाफर की सात साल की बच्ची के फूल से जनाजे पर लाचार बाप को तसल्ली के फूल दिए।

भीषण ठंड में रात दस बजे पसीने-पसीने कर देने वाली जब मौत की खबर आयी तो ट्रामा सेंटर भागा। फिर माडल हाउस, और फिर कब्रिस्तान। बतौर कैमरा मैंन मैं नदीम जाफर जी को 17-18 वर्षों से जानता हूं। 1998-99 में उस वक्त नदीम से मेरी मुलाकात हुई थी जब वो बतौर स्टिंगर दूरदर्शन में बतौर कैमरामैन काम करते थे। इसके बाद लम्बे अर्से तक वो ईटीवी मे रहे। फिर जनसंदेश न्यूज चैनल और फिर ना जाने कहां कहां। पन्द्रह दिन पहले नदीम इसी बेटी (जिसकी आज मौत हो गयी) को क्राइस्ट चर्च लेने आये थे। स्कूल के गेट पर मुलाकात में नदीम ने बताया कि नौकरी छूट गयी है बहुत परेशान हूं। आज रात दस बजे पता चला कि नदीम से उसकी बेटी भी छूट गयी। रात साढ़े दस बजे ट्रामा सेंटर पर देखा.. रात 11 बजे नदीम के घर पर देखा.. रात एक बजे तक कब्रिस्तान में देखा..

नदीम के मीडिया के सारे साथी भी छूट गये थे। कोई नजर नही आया। दिनभर सत्ताधारियों को फूल और बधाई देकर थककर सो गये होगे। दुखियारे बाप को तसल्ली और बेटी के फूल से जनाजे पर फूल चढ़ाने कैसे आते।

-नवेद शिकोह

(नावेद जी बहुत ही संवेदनशील पत्रकार हैं)

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