- डब्ल्यूएचओ ने चेताया, भारत में युवाओं में कार्डियोवैस्क्यूलर रोगों में 10 फीसदी बढ़त
- न्यूनतम नुकसान पहुंचाने वाले तरीकों के माध्यम से 32 साल के मरीज का किया गया सीएबीजी
- कार्डियो वैस्क्यूलर बीमारियों का उपचार करने के लिए बेहतर प्रौद्योगिकी और नवोन्मेशी तरीकों का किया जा रहा उपयोग
नई दिल्ली, 21 नवंबर, 2018ः एक दशक पहले हृदय रोगों की बात करते हुए उम्र मायने रखती थी क्योंकि यह एक प्रमुख कारण था जो हृदय रोगों की समस्या को बढ़ाता था। तनाव, नुकसानदायक जीवनशैली और खराब समय सारिणी जैसे कारक मौजूदा समय में युवा पीढ़ी के बीच कई स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ावा देने में योगदान दे रहे हैं, हृदय रोग आज के समय में युवा पीढ़ी के लिए सामान्य बीमारी बन गई है।
जब 32 वर्शीय प्रकाश को मनीपाल हाॅस्पिटल, सेक्टर 6, द्वारका में डाॅ. युगल के. मिश्रा के सामने लाया गया जो उसके लक्षण स्पश्ट तौर पर इशारा कर रहे थे कि मरीज़ को तत्काल कोरोनरी आर्टरी बाईपास ग्राफ्ट की जरुरत है। वह सीन में गंभीर दर्द, सांस लेने में परेशानी, अत्यधिक थकान और घबराहट जैसी समस्याओं के साथ आया था।
जब भी किसी मरीज़ को हार्ट अटैक आता है तो हृदय के कुछ हिस्सों में रक्त की पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति न हो पाने के कारण उन्हें भरपूर मात्रा में आॅक्सीजन और पोशक तत्व नहीं मिल पाते हैं। सीएबीजी सर्जरी के माध्यम से उन हिस्सों में एक मुक्त नस या आर्टियल बाईपास का इस्तेमाल कर नए सिरे से खून पहुंचाया जाता है। यह हृदय के सामान्य हिस्सों से ब्लाॅक आर्टरियों को बाईपास कर प्रभावित इलाकों से जोड़ा जाता है। मुक्त नस या आर्टरी को मरीज के षरीर के अन्य हिस्सों से लिया जाता है जैसे पैर या फीमर यानी जांघ की हड्डी या भुजाओं या फिर सीने के हिस्सों से ही इन्हें लिया जाता है।
डाॅ. युगल के मिश्रा, प्रमुख, कार्डिएक साइंसेज़ एवं प्रमुख कार्डियो वैस्क्यूलर सर्जन, मनीपाल हाॅस्पिटल्स, द्वारका, नई दिल्ली ने कहा, ’’चूंकि मरीज 32 वर्श का युवा था हमारा लक्ष्य ऐसी सर्जिकल प्रक्रिया अपनाना था जो उन्हें जल्दी से जल्दी अपने पैर पर खड़े होने में सक्षम बनाना था। न्यूनतम नुकसानदायक सर्जिकल प्रक्रिया न सिर्फ रक्त का न्यूनतम नुकसान सुनिश्चित करता है बल्कि इसमें मरीज में सुधार की अवधि भी कम होती है इसके साथ अस्पताल में भी कम समय ठहरना पड़ता है। बाईपास ग्राफ्टिंग का पारंपरिक तरीका रिब केज या स्टरनम के माध्यम से कट लगाना होता है जिसका मतलब है सीने की हड्डियों में कट लगाना। इस तरीके का उद्देश्य पारंपरिक सीएबीजी से होने वाले नुकसान को कम करना और इसके साथ ही सर्जिकल रीवैस्क्यूलराइजेशन के उपयोग और टिकाऊपन को सुरक्षित रखना।’’
हालांकि जोखिम के कई कारण बताए गए; धूम्रपान और तंबाकू के अन्य रूप, डिसलिपिडेमिया या ब्लड लिपिड का उच्च स्तर और उच्च रक्तचाप युवाओं में जोखिम के प्रमुख कारण हैं।
डाॅ. मिश्रा ने बताया, ’’सीएबीजी की जरूरत वाले मरीजों की औसत उम्र काफी हद तक कम होती जा रही है। शोध में चौकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। 90 के दशक के मध्य में भारत में हर वर्श करीब 10,000 सीएबीजी सर्जरियां होती हैं। मौजूदा आंकड़े इसमें महत्वपूर्ण वृद्धि दर्शाते हैं और आज के समय में हर वर्ष करीब 60,000 सर्जरियां होती हैं। मेरे अनुभव में मरीजों की उम्र घटकर 20 से 40 वर्शों के बीच रह गई है और यह खतरनाक आंकड़ा है। 2015 तक 6.2 करोड़ भारतीय सीएडी से पीड़ित हैं जिनमें से 2.3 करोड़ मरीज 40 वर्श से कम उम्र के थे। अनुमान दर्षाते हैं कि 2025 तक सीएडी में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हो जाएगी।’’
बेहतर प्रौद्योगिकी और नवोन्मेश के साथ सर्जरी हृदय के धड़कते हुए या रक्त की पंपिंग करते हुए भी की जा सकती है और इसे आॅफ पंप कोरोनरी बाईपास (ओपीसीएबी) सर्जरी कहते हैं। यह प्रक्रिया ज्यादातर मरीजों में की जा सकती है।
मिनिमली इनवैसिव डायरेक्ट कोरोनरी आर्टरी बाईपास (एमआईडीसीएबी) परफ्यूज़न पंप का उपयोग किए बगैर किया जा सकता है। जैसा कि नाम से पता चलता है कि इसमें किया गया कट अपेक्षाकृत छोटा होता है और हृदय के पास सीने के बाएं हिस्से में किया जाता है। हृदय तक पहुंच के लिए रिब का छोटा हिस्सा निकाला जाता है। यह उन मरीजों में किया जा सकता है जिन्हें कट के करीब आर्टरियों पर एक या दो ग्राफ्ट की आवश्यकता होती है।






