समुद्र मंथन के समय जब हलाहल विष निकला, जो पूरी सृष्टि को नष्ट कर सकता था, तब देवता और असुर पीछे हट गए। लेकिन भोलेनाथ ने वह विष अपने कंठ में धारण कर लिया अर्थात पी लिया, पर निगला नहीं। कंठ नीला पड़ गया, ‘नीलकंठ’ कहलाए, और प्राणी-मात्र के कल्याण के लिए खुद को समर्पित कर ‘महादेव’ बने।
यह घटना सिर्फ पौराणिक नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा सबक है।
जैसे शिव ने समाज के लिए विष (निंदा, अपयश, उपेक्षा, आलोचना का जहर) पीया और उससे ऊपर उठकर देवों के देव बने, वैसे ही हमें भी जीवन में आने वाले हर कड़वे अनुभव को सहन कर, संतोष की शक्ति से महामानव बनना है।
भगवान शिव का एक खूबसूरत नाम है आशुतोष जो थोड़े से भक्ति-भाव से भी तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। उनका संदेश स्पष्ट है:
“जो कुछ मिला है, जितना मिला है उसी में प्रसन्न और संतुष्ट रहो।”
शिव पूर्ण काम-मुक्त हैं न वासना, न लोभ, न इच्छाओं का बोझ। उनकी इच्छा सिर्फ राम-नाम जपने और राम-दर्शन की है। वे बहिर्मुखी नहीं, अंतर्मुखी हैं। अंतर्मुखी बनकर ही हम शांत, क्षमावान, परमार्थी और लोक-मंगल के संकल्प पूरे कर पाते हैं।
जीवन में संतोष सबसे बड़ा खजाना है।
जो मिला, उसी में खुश रहना सीखो तब जहर भी अमृत बन जाता है, और इंसान महामानव!हर हर महादेव!
संतोष से जीवन को आशीष दो, जैसे शिव ने सृष्टि को।







