सभी धर्मों में अनेको कुरीतियाँ प्रचलित होती है और हिन्दू धर्म में भी ऐसी ही अनेकों कुरीतियाँ प्रचलित है जिनका कोई भी तर्क मौजूद नहीं है लेकिन फिर भी वे वर्तमान में भी अनवरत जारी है। मृत्युभोज भी एक ऐसी ही कुरीति है जिसे वर्तमान में बंद किये जाने की आवश्यकता है। मृत्युभोज खाने एवं खिलने की परम्परा हजारो सालो से कायम है लेकिन आज हम आपको बताएंगे की आखिर क्यों मृत्युभोज नहीं खाना चाह
हिन्दू धर्म में मुख्य 16 संस्कार बनाए गए है, जिसमें प्रथम संस्कार गर्भाधान एवं अन्तिम तथा 16वाँ संस्कार अन्त्येष्टि है। इस प्रकार जब सत्रहवाँ संस्कार बनाया ही नहीं गया तो सत्रहवाँ संस्कार ‘तेरहवीं का भोज’ कहाँ से आ टपका। किसी भी धर्म ग्रन्थ में मृत्युभोज का विधान नहीं है बल्कि महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है कि मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती है।
महाभारत का युद्ध होने को था, अतः श्री कृष्ण ने दुर्योधन के घर जाकर युद्ध न करने के लिए संधि करने का आग्रह किया। दुर्योधन द्वारा आग्रह ठुकराए जाने पर श्री कृष्ण को कष्ट हुआ और वह चल पड़े, तो दुर्योधन द्वारा श्री कृष्ण से भोजन करने के आग्रह पर कृष्ण ने कहा कि ’’सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनैः’’ अर्थात जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो, खाने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए।
अतः आप आज से संकल्प लें कि आप किसी के मृत्यु भोज को ग्रहण नहीं करेंगे और मृत्युभोज प्रथा को रोकने का हर संभव प्रयास करेंगे। हमारे इस प्रयास से यह कुप्रथा धीरे धीरे एक दिन अवश्य ही पूर्णत: बंद हो जायेगी।








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