मेरा विचार : अंशुमाली रस्तोगी
संपादकीय पेज पर लेख व संपादकीय अवश्य छपते हैं पर उन पर अब बहस नहीं होती। न ही प्रतिवाद छपते हैं। बहुत ही चालाकी से चीजों को खत्म किया जा रहा है। अखबारों (हिंदी) में एक दौर ऐसा भी रहा है, जब संपादकीय पेज पर आने वाले लेखों पर लंबी बहसें होती थीं। पत्र स्तंभ मजबूत होते थे। संपादकीय बिना किसी सरकारी दबाव के लिखे जाते थे। ‘जनसत्ता’ और ‘अमर उजाला’ में ऐसी कितनी ही बहसें मैंने पढ़ी हैं। किंतु आज सब गायब है।
2014 के बाद से अखबारों की लाइन गड़बड़ाने लगी है। सरकारी स्तुति अधिक छपने लगी है। संपादकीय पेज पर मंत्री-मुख्यमंत्री के लेख आने लगे हैं। अखबार अपनी राय संपादकीय में खुलकर नहीं रख पा रहे। उन्होंने मुद्दे को पीने का आसान रास्ता चुन लिया है।
पत्र-स्तम्भ तो गायब ही समझिए। पत्रों की जगह ट्वीट और फेसबुक पोस्टों ने ले ली है। विचार और विमर्श ठहर गया है संपादकीय पेज पर। तेज लेख छपते नहीं। इसीलिए तेज लिखने वाले भी किनारे कर दिए गए हैं।
देश ही नहीं विचार भी संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। अखबारों का यों सुस्त और निस्तेज हो जाना अभिव्यक्ति के लिए घातक है।







