लोग सांप को मारें नहीं, इसीलिए नाग पंचमी बनी

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कल नाग पंचमी है , यह पर्व सर्प पंचमी नहीं है , नाग एक राज- समाज रहा है , बस्तर इलाके में आज भी आदिवासियों का एक समाज नाग कहलाता है. वासुकी और तक्षक उनके देव और यह पर्व उनके लिए है . नागपूजन करते समय इन 12 प्रसिद्ध नागों के नाम लिये जाते हैं- धृतराष्ट्र, कर्कोटक, अश्वतर, शंखपाल, पद्म, कम्बल, अनंत, शेष, वासुकी, पिंगल, तक्षक और कालिय। लोग नाग पंचमी पर सपेरों को बुला कर कोबरा या अन्य सांप को दूध पिलाते हैं , असल में सांप दूध पी ही नहीं सकता, जबरदस्ती सांप को दूध के कटोरे में घुसेड़ने से उसके फेंफडे, आँख में दूध अटक जाता है और इस तरह वह अत्यंत पीड़ा के साथ मर जाता है .
पारम्परिक भारतीय समाज में नाग पंचमी पर सर्प पूजा असल में प्रक्रति और पर्यावरण संरक्षण का एक उपाय था, बरसात होते ही सांप अपने बिलों से बाहर निकलते हैं और साथ ही चूहे भी बिलों से बाहर आते हैं, अब समाज कि नजर में सांप एक खतरनाक जीव है, सो लोग देखते ही सांप मार देते थे, इससे चूहों की आबादी बढती, बरसात के लिए घर के भंडारे- कोठे में एकत्र अनाज पर चूहे एकाधिकार करते. लोग सांप को मारें नहीं, इसी के लिए नाग पंचमी बरसात यानि सावन महीने में रख दी गयी .
खेत, जंगल का पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने और जैव विविधता के संरक्षण के लिए आज भी पर्यावास में सर्प अनिवार्य है , उसे मारें नहीं, पकडवा कर दूर जंगल में फिंकवा दें, कम से कम नाग पंचमी के गलत मायने निकाल कर उसे दूध पिलाने का प्रयास ना करें।
समाज में वैसे भी दो पैर वाले ऐसे सर्प पर्याप्त हैं जो बगैर कारण के आपको डंस सकते है और वे पर्यावरण के लिए लाभदायक भी नहीं .दरअसल, दूध पिलाना नागों की मृत्यु का कारण बनता है। ऐसे में नागपंचमी के दिन नागों को दूध पिलाना अपने हाथों से अपने देवता की जान लेने के समान है। इसलिए ऐसा करने से बचना चाहिए।

पंकज चतुर्वेदी की वॉल से