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    पौराणिक कथाओं में असत्य नही, गूढ़ वैज्ञानिक रहस्य हैं छिपे!

    ShagunBy ShagunJune 6, 2020 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    अरविन्द कुमार ‘साहू’

    लॉक डाउन पीरियड में धार्मिक व पौराणिक धारावाहिकों की खूब धूम रही। इन धारावाहिकों ने भारत की अस्थावान जनता व युवा जिज्ञासु पीढी को भी अपने कथानक से इतनी अच्छी तरह बांध रखा था कि दर्शक संख्या के रिकॉर्ड टूट गये। दूरदर्शन जैसे सरकारी चैनल पर रामायण व महाभारत जैसे कथानकों के चलते बढ़ने वाली टीआरपी को गिनीज बुक ऑफ़ रिकार्ड में दर्ज करना पड़ा । यह निश्चित रूप से हमारे देश की धर्म परायण जनता का अपनी सभ्यता, संस्कृति में अटूट विश्वास और आस्था दर्शाने वाला है।

    इधर कुछ युवाओं ने सहज शंका भी व्यक्त किया कि वर्तमान में रामायण, महाभारत, दुर्गासप्त्शती आदि पौराणिक ग्रंथों पर अधारित फिल्मांकन के दृश्य देखते हुए बहुत सी घटनाएं असहज व असत्य प्रतीत होती है। उनकी यह शंका कुछ हद तक निर्मूल भी नही। लेकिन उसका प्रमुख कारण जो विद्वानों ने बताया कि एक ही कथानक पर विश्व के अलग- अलग क्षेत्रों में उपलब्ध पुस्तकों में अलग विवरण मिलते हैं। इनमें तारतम्य स्थापित करना बहुत मुश्किल काम है, जिसमें फिल्मकार अपनी रुचि व शोध के अनुसार क्षेत्र विशेष में प्रचलित स्वीकृत मान्यताओं के आधार फिल्मांकन करते हैं।

    इसका दूसरा कारण यह भी है कि फिल्मांकन में कल्पना की उड़ानों को मिलने वाली पर्याप्त छूट की गुंजायश मिल जाती है। जैसे कुछ लिखे कबीर दास, कुछ गढ़े किर्तनिया । एक बात किसी के मुँह से निकलने के बाद हजारों लोगों तक पहुँचते- पहुँचते वास्तविक स्वरुप के अर्थ से भिन्न स्वरुप में भी बदल जाती है।

    तीसरी बात इन अधिकाँश प्राचीन ग्रंथों में कथेतर सामग्री या रूपक प्रसंग पर्याप्त मात्रा में पहले से ही उपस्थित हैं। जिससे कई आधुनिक बुद्धिजीवी इनकी घटनाओं को शब्दश: तर्क की कसौटी पर कसने लगते हैं और संतुष्टि न होने पर प्राचीन इतिहास के महापुरुष व देव स्वरुप पात्रोँ के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर देते हैं। उन्हें लगता है कि इतने प्राचीन युग में आधुनिक हवाई जहाज जैसे पुष्पक विमान, समुद्र पर पुल, बिना तार की मोबाइल जैसी (मानसिक)संचार प्रणाली और मिसाईल जैसे हथियार कोरी गप्प के सिवा कुछ नही हैं।

    मेरा अध्ययन व विचार कहता है कि जिस तरह बिना आग के धुवाँ नही उठता, बिना तिल के ताड़ नही बन सकता , वैसे ही बिना थोड़ी भी सच्चाई या सम्भावना के सौ प्रतिशत सत्य जैसी कल्पना भी नही गढ़ी जा सकती। उसी तरह इन प्राचीन गाथाओं को भी एकदम से काल्पनिक कह देना कहीं से न्याय संगत नही है। इसका कारण यह है कि पहले ये रचनाएं गुरु शिष्य परम्परा में ज्यादातर श्रवण परम्परा या रटंत पद्धति से ही पीढी दर पीढी आगे बढती थी। हस्तलिखित पुस्तकों की अनुकृति पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नही हो पाती थी। जिससे कई अन्य लेखकों की पुस्तके या मिलते जुलते कथानक (क्षेपक रूप में) कुछ गड्डमड्ड या मिश्रित हो जाती थी।

    अगली सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात कि यह कि सभी प्राचीन गाथाएँ यहाँ तक कि वेद-पुराण भी काव्य स्वरुप में ही है, जहाँ कवि अपनी कथा या विचार स्वरुप को छंदों में ढालकर काव्य शास्त्र के अनुरुप रुचिकर अथवा जन मन रंजन बनाने में पीछे नही रहते थे। इस कारण से कई बार आधुनिक विवेचकों के अनुवाद, अर्थाँतर या भावार्थ टीका में भी अन्तर हो जाना स्वाभाविक हो सकती हैं। इससे कई बार प्राचीन देशकाल की सभ्यता संस्कृति को समझने में एकरूपता न होने से भी भ्रम स्वाभाविक ही पैदा हो जाता है।

    लेकिन अनेक विवेचनओं, शोधकार्यों को पढ़ने तथा बहुपक्षीय विचारोपरान्त यही प्रतीत होता है कि उपरोक्त महाकाव्यों में वर्णित अधिकाँश पात्र एव घटनाएं सत्य हैं, सिर्फ उनके काव्य स्वरुप, लालित्यमय भाषाशैली, रूपकों- क्षेपकों की मिश्रित उपस्थिति व कहीं – कहीं अतिशयोक्ति अलंकारों के प्रयोग ने इसे सामान्य पाठकों के लिये दुष्कर व थोड़ा असहज बना दिया है।

    लेकिन जो मनस्वी इनमें सार्थक दृष्टि का उपयोग करते हैं उनकी शंका का समाधान भी सहज ही हो सकता है। इसे हम आस्था व श्रद्धा विश्वास से भी जोड़ सकते हैं।राम सेतु जैसे कुछ प्रसंगों की तो वैज्ञानिक प्रमाणिकता भी सिद्ध हो चुकी है।

    अत: यह कहना अतिशयोक्ति नही होगा कि पिछले कुछ सौ वर्षों में लिखी पद्मावत, पृथ्वीराज रासो, आल्हा उदल, महाराणा प्रताप सिंह, अथवा आजादी के बाद के काव्य ग्रंथों रानी लक्ष्मीबाई व वीरव्रती चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस जैसे विरले नायकों पर लिखे काव्यग्रंथों पर सैकड़ों वर्षों बाद ऐसी ही टिप्पणियाँ आ सकती हैं। क्योंकि जब आज की बहुत सी पुस्तकों के प्रसंगों कई मुद्दों पर एक रूपता नही मिल पाती तो हजारों वर्ष प्राचीन ग्रंथों में ऐसे मतैक्य कोई बड़ी बात नही। जरुरत इस बात की है कि ऐसे में हम अपने तुलनात्मक स्वाध्याय को स्वयं बढ़ाएँ और नीर-क्षीर विवेक से घटनाओं की सत्यता व तारतम्य को तार्किक तरीके से समझें। विस्तृत अध्ययन व व्यापक शोध ही इसका संतुष्टिकारक समाधान है।

    Shagun

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