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    Home»साहित्य

    संज्ञा खड़ी हों कटघरे में और विशेषण को हो जेल!

    ShagunBy ShagunMarch 19, 2026Updated:March 19, 2026 साहित्य No Comments7 Mins Read
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    Nouns should be put in the dock and adjectives should be jailed!
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    अब शब्दों का हो ऑपरेशन, आहत होने से बचे भावनाओं का भविष्य!

    व्यंग्य आलेख : राहुल कुमार गुप्ता

    यह एक गंभीर विडंबना है कि जिस देश के आंगन में हिंदी साहित्य और भाषा का विज्ञान विश्व में सर्वोत्कृष्ट रहा उसे आज के सियासी दौर में निकृष्ट करने का जो चलन चल पड़ा है, वो समाज को मौन साहित्य, मौन इतिहास और मौन भाषा की ओर ले जाने को अग्रसर है जैसे आदिपाषाण काल में पुनः प्रवेश करने का इंतजाम किया जा रहा हो।

    हिंदी साहित्य के सबसे मुखर कवि संत कबीर आज के दौर में होते तो लाखों मुकदमे उनकी रचनाओं के कारण उन पर लद गए होते। उनकी हर पंक्तियां आज भी समाज के लिए आईना है।

    “पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
    ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।”

    उनकी इन पंक्तियों में पंडित शब्द का अर्थ विद्वान से लिया गया है।

    उन्होंने केवल किसी एक जाति किसी एक धर्म किसी एक क्षेत्र को लेकर अपना व्यक्तित्व छोटा नहीं किया, उन्होंने समाज से बुराइयों को दूर करने के लिए बेधड़क लिखा और जरूरत के हिसाब से लोक सामान्य की भाषा में समझाने के लिए तमाम विशेषण भी प्रयुक्त किए।

    संत शिरोमणि तुलसीदास जी ने भी अपनी रचनाओं में ऐसे बहुत से विशेषणों का उपयोग किया है, जिससे उस समय का लोकसामान्य उस भाषा को सहजता से समझ सके। हिंदी साहित्य और भाषा की परम्परा में लगभग सभी रचनाकारों के चलते हमारी भाषा और साहित्य की ये खरी और बेधड़क परंपरा फली-फूली। आज उसी समाज की भावनाएं एक प्रश्नपत्र के ‘विशेषण’ से कांच की तरह चटक जाती हैं। यूपीएसआई की परीक्षा में एक प्रश्न ‘अवसर के साथ बदल जाने वाला ‘ के विकल्प में एक विशेषण शब्द “पंडित” विकल्प के रूप में क्या आया मानो सियासत में भूचाल आ गया। यहां पंडित जाति न होकर विशेषण के रूप में है जिसका अर्थ विद्वान होता है। अर्थात जो विद्वान है वही पंडित है। पंडित एक विशेषण है और ब्राह्मण एक जाति।

    इस प्रश्न को लेकर भारत की एक विशेष जाति के बहुत से लोगों ने इसका विरोध दर्ज कराया है, और कराएं भी क्यों नहीं? जब आज का सियासी दौर हर शब्द विशेष में सियासत ढूंढ रहा है। ऐसे सामान्य से शब्दों की वजह से भी अब राजनीति के गलियारों में संवेदनाओं का वह ज्वार उठता है कि तर्क, तथ्य और भाषा विज्ञान सब पत्थर बनकर डूब जाते हैं। अब समय आ गया है कि हम अपनी भाषा और साहित्य का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ मोड में पुनरावलोकन करें। इसके लिए एक क्रांतिकारी सुझाव है कि शब्दकोशों से उन तमाम संज्ञाओं, विशेषणों, लोकोक्तियों और मुहावरों को ही ‘डिटॉक्स’ कर दिया जाए, जिनसे किसी न किसी धर्म, मजहब, जाति या संप्रदाय की ‘सेंसिटिव’ भावनाओं को खरोंच आने का अंदेशा हो। आखिर जब जड़ यानी ‘शब्द’ ही नहीं रहेगा, तो भावनाओं के आहत होने का यह नाजुक पेड़ फल-फूल कैसे पाएगा?

    हकीकत तो यह है कि आजकल की भावनाएं इतनी ‘लो-बैटरी’ पर चल रही हैं कि किसी भी शब्द की चिंगारी से उनमें ‘शॉर्ट सर्किट’ हो जाता है। राजनीति ने हमें यह अद्भुत चश्मा पहनाया है जिसमें हम अखंड भारत के लिए नहीं अपितु अखंड जाति/समाज के लिए या अखंड स्वार्थ के लिए लड़ रहे हैं और अब इसी दिशा में अग्रसर हैं, इसमें हमे बुराई नहीं दिखती, बल्कि कुछ विशेषण शब्दों के उच्चारण में सामाजिक असुरक्षा दिखने लगती है। साहित्य के उन तमाम पुराने पन्नों को गंगाजी में प्रवाहित कर देना ही बेहतर है, जहाँ कवियों और लेखकों ने समाज की विसंगतियों पर कटाक्ष करने के लिए लोक-भाषा का सहारा लिया था। अगर प्रेमचंद आज होते और ‘गोदान’ लिख रहे होते, तो शायद उन्हें हर पात्र का नाम रखने से पहले किसी ‘सेंसर बोर्ड’ या ‘जाति पंचायत’ से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना पड़ता।

    यह कितनी सुखद कल्पना है कि आने वाली पीढ़ियां एक ऐसे शब्दकोश के साथ बड़ी होंगी जो पूरी तरह ‘बांझ’ होगी। उसमें न कोई कटाक्ष होगा, न कोई व्यंग्य, और न ही कोई ऐसा मुहावरा जो किसी को आईना दिखा सके। जब शब्द ही नहीं होंगे, तो नई पीढ़ियों को उन्हें भुलाने में बड़ी आसानी होगी। वे एक ऐसी ‘म्यूट’ संस्कृति में पलेंगे जहाँ सब कुछ ‘व्हाइटवॉश’ किया हुआ होगा।

    केवल भाषा और साहित्य ही क्यों मजहबी और धार्मिक ग्रंथों की भी ‘क्लीन शेव’ जरूरी है, क्योंकि उनमें लिखे शब्द अक्सर आधुनिक राजनीति की सुविधा के आड़े आ जाते हैं। अगर संविधान से भी ऐसे ‘कष्टदायक’ शब्द हटा दिए जाएं जो भेदभाव या ऊंच-नीच की याद दिलाते हों, तो कागज पर तो हम रातों-रात दुनिया के सबसे आदर्श समाज बन ही जाएंगे। धरातल पर भले ही कुछ न बदले, पर फाइलों और पन्नों पर ‘रामराज्य’ की स्थापना शब्दों को मिटाकर ही की जा सकती है।

    संविधान निर्माताओं ने तो शायद बड़ी मासूमियत में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ दे दी थी, पर उन्हें क्या पता था कि भविष्य में ‘अभिव्यक्ति’ से ज्यादा हर सामान्य शब्दों में भी ‘भावनाओं की रक्षा’ महत्वपूर्ण हो जाएगी। अब परीक्षा आयोजित करने वाले बोर्ड को चाहिए कि वे प्रश्न पत्र तैयार करने के लिए मात्र पंडितों (विद्वानों) को नहीं, बल्कि हर दल के ‘इवेंट मैनेजर’ या ‘पॉलिटिकल पीआर’ विशेषज्ञ को भी बुलाएं।जिससे वे ऐसे प्रश्न, प्रश्न पत्र से हटाने के लिए कह सकें जिससे किसी की भावनाएं आहत न हों। राजनीति का यह सुरक्षा कवच इतना अभेद्य होना चाहिए कि भाषा केवल एक ‘प्रशस्ति गान’ बनकर रह जाए।

    साहित्य का इतिहास गवाह है कि शब्द तभी धारदार होते हैं जब वे समाज की कमजोर नस को दबाते हैं। लेकिन आज के दौर में ‘कमजोर नस’ दबाना ‘आतंक’ की श्रेणी में आता है। यदि हमें भविष्य के प्रश्न पत्रों में ‘आहत’ होने वाली घटनाओं को रोकना है, तो भाषा की नसबंदी ही एकमात्र विकल्प बचता है। हमें एक ऐसी ‘फिल्टर्ड’ शब्दावली तैयार करनी होगी जो इतनी चिकनी हो कि दिमाग पर कोई असर ही न छोड़े। विशेषणों का तो पूर्ण बहिष्कार होना चाहिए, क्योंकि विशेषण ही तो वह अपराधी है जो किसी को ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ कहने का साहस करता है। समानता का असली अर्थ यही है कि न कोई अच्छा हो, न कोई बुरा, बस सब ‘राजनीतिक रूप से सही’ हों।

    अंततः, इस भाषाई शुद्धिकरण का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि बहस के सारे रास्ते बंद हो जाएंगे। जब संज्ञाएं प्रतिबंधित होंगी और विशेषण जेल में होंगे, तो समाज में एक दिव्य शांति व्याप्त होगी।

    हम एक ऐसी सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ बोलना जोखिम है और चुप रहना ‘मर्यादा’। शब्दों को शब्दकोश से मिटाना शायद थोड़ा तकनीकी काम हो, लेकिन जिस तत्परता से हमारी स्वार्थ और अहंकार की राजनीति शब्दों के पीछे पड़ी है, उसे देखकर लगता है कि बहुत जल्द हम ‘इशारों की भाषा’ में लौट जाएंगे। आदिमानव के पास भी शब्द नहीं थे, इसलिए शायद वे हमसे ज्यादा सुखी थे। न कोई शब्द था, न कोई जाति, और न ही किसी की ‘भावना’ आहत करने वाला साहित्य या भाषा का कोई प्रश्न! न कोई लोकोक्ति मुहावरा, दोहा, रचना आदि जो किसी को आहत कर सके! चलिए, इतिहास के पहिये को पीछे घुमाते हैं और एक ऐसे कोरे कागज वाले भविष्य का निर्माण करते हैं जहाँ केवल ‘मौन’ ही सबसे बड़ा ‘राष्ट्रवाद’ हो!

    साहित्यिक घोषणा एवं अस्वीकरण: प्रस्तुत आलेख एक व्यंग्य रचना है। लेखक स्पष्ट करता है कि यहाँ व्यक्त विचार पूर्णतः निजी हैं और इनका किसी भी राजनीतिक दल या शासकीय नीति से कोई सरोकार नहीं है। लेखक का उद्देश्य हिंदी साहित्य और हिंदी भाषा की महान परंपरा का निर्वहन करते हुए भाषाई समझ को बढ़ावा देना है; किसी भी समुदाय या वर्ग की धार्मिक अथवा सामाजिक भावनाओं को आहत करने का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष इरादा नहीं है।

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